नम्रता-रवि खस से बना रहे नेचुरल फेब्रिक, सतेंद्र ने शुरू किया फलों से फूड प्रोडक्ट बनाने का स्टार्टअप
इंदिरा गांधी एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के इनक्यूबेशन सेंटर ‘रफ्तार एग्रीबिजनेस इन्क्यूबेटर’ (आर-एबीआई) में उद्भव और अभिनव याेजना के तहत सलेक्टेड स्टार्टअप को ट्रेनिंग दी गई। दो महीने की ट्रेनिंग के दौरान एक्सपर्ट्स ने आंत्रप्रेन्योर्स को स्टार्टअप आइडिया की कमियां दूर करने और प्लान बेहतर करने के टिप्स दिए। सेंटर से जुड़े हुए रवि कांत और नम्रता खस से नेचुरल फेब्रिक बनाने और सतेंद्र सिंह जामुन और सीताफल से नेचुरल फूड आइटम बनाने के आइडिया पर काम कर रहे हैं। सेंटर के सीईओ डॉ. हुलास पाठक ने बताया कि अब कुछ चुनिंदा स्टार्टअप्स को सेंट्रल गवर्नमेंट फंड देगा। फंडिंग के लिए सेंट्रल इनक्यूबेशन कमिटी के सामने प्रजेंटेशन होगा। इसमें चुने जाने वालों को 5 लाख से 25 लाख रुपए तक की ग्रांट दी जाएगी।
खस से बना रहे ऐसा कर्टन जिससे रूम टैम्प्रेचर रहेगा कम, फेब्रिक की थिकनेस कम करने का कर रहे प्रयास
रवि कांत सोनी और नम्रता दिवाकर खस से कर्टन बनाने के स्टार्टअप आइडिया पर काम कर रहे हैं। इसका प्रोटोटाइप तैयार हो गया है। नम्रता ने बताया, ये कर्टन पूरी तरह नेचुरल फेब्रिक बेस्ड है। ये गर्मी में घर का तापमान कम रखने और कमरों में कूलिंग बनाए रखने में मददगार होगा। खस से जो फेब्रिक हमने तैयार किया है उसे सामान्य कपड़े की तरह भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इसकी थिकनेस अभी 3 से 5 एमएम है। इसे हम और कम करने की कोशिश में जुटे हैं। थिकनेस कम होने के बाद इससे कर्टन के अलावा अन्य कपड़े भी बनाए जा सकेंगे। इस फेब्रिक में एरोमा भी है जो डिप्रेशन ठीक करने का काम करता है। घर के अलावा इसे ऑफिस, ओपन गैलरी और बस वगैरह में भी इस्तेमाल कर सकते हैं। रवि ने दावा किया कि हम पिछले एक साल से इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। रॉ मटेरियल नहीं मिलने के कारण कर्टन का प्रोटोटाइप बनाने में ही लगभग 3 महीने लग गए। अभी इसकी मशीन बनाने पर भी काम कर रहे हैं। इनके स्टार्टअप आइडिया को अभिनव योजना के तहत चुना गया है।
अभिनव योजना : ऐसे आंत्रप्रेन्याेर्स जिनके पास एग्रीकल्चर से संबंधित अच्छा बिजनेस आइडिया है, जिन्होंने अपने प्रोडक्ट या आइडिया का प्रोटोटाइप भी तैयार कर लिया है उन्हें इस कैटेगिरी में शामिल किया गया है। इसके तहत आंत्रप्रेन्याेर्स काे 5 लाख रुपए की ग्रांट दी जाती है।
उद्भव योजना : ऐसे आंत्रप्रेन्याेर्स जाे कृषि या कृषि उत्पादों से संबंधित काम शुरू कर चुके हैं, जिनका प्रोडक्ट पूरी तरह तैयार है, उन्हें बिजनेस ग्राेथ के लिए 25 लाख रुपए की ग्रांट दी जाती है।
सात स्व सहायता समूहों से जुड़कर कर रहे काम, बस्तर में शुरू की प्रोसेसिंग यूनिट
सतेंद्र सिंह लिलहारे पिछले एक साल से सीताफल और जामुन से अलग-अलग फूड प्रोडक्ट बनाने में जुटे हैं। सात स्व सहायता समूह उनसे जुड़कर काम कर रहे हैं। समूह के सदस्य जंगल से सीताफल और जामुन लाते हैं और फिर सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट के जरिए उससे शेक और स्लाइस बनाते हैं। फिर कुल्फी, शरबत, शॉट जैसे कई प्रोडक्ट बनाते हैं। आमतौर पर सीताफल और जामुन चार से पांच दिनों में खराब हो जाता है लेकिन प्रोसेसिंग के बाद इसे 18 महीने तक यूज कर सकते हैं। सतेंद्र ने दावा किया कि हमारा प्रोडक्ट पूरी तरह नेचुरल है। हम कोई केमिकल यूज नहीं करते। उन्होंने बताया, अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी बैंगलोर में स्कॉलरशिप पर सोशल आंत्रप्रेन्योरशिप की पढ़ाई करने के बाद मैंने किसान उत्पादन संगठन के लिए अजीम प्रेमजी और नाबार्ड के प्रोजेक्ट में 3 साल काम किया। इसी दौरान ये स्टार्टअप आइडिया सूझा। अगले महीने से वे इमली से प्रोडक्ट बनाने का काम करेंगे, जिसमें 300 महिलाओं को 90 दिनों तक रोजगार मिलेगा। उन्होंने अपनी यूनिट लखनपुरी उत्तर बस्तर में शुरू की है। वहीं, से राज्य के अलग-अलग जिलों में प्रोडक्ट सप्लाय कर रहे हैं। एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के इनक्यूबेशन सेंटर ने उन्हें उद्भव योजना के तहत चुना है।
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