प्रभु येसु गोशाला में जन्मे थे। उसी याद का अनुपम और आध्यात्मिक प्रतीक चरनी है। क्रिसमस बिना चरनी के मुकम्मल होता ही नहीं। चरनी तो आज भी बनती है, लेकिन सिर्फ बनती ही है। अब तो बाजार में भी चरनी मिलती है, जिसे विश्वासी खरीदकर अपने घर ले जाते हैं। पहले तब बनती थी, जब एक पुआल के साथ एक नेकी जुड़ी होती थी।
आगमनकाल से नेकी की शुरुआत हो जाया करती है, जो कोई एक नेकी करता तो एक पुआल चरनी के लिए रख लेता। इस प्रकार एक-एक पुआल यानी एक-एक नेकी का जब खजाना हो जाता है, तो पवित्र चरनी बनाई जाती थी। यह प्रेरणा माता बेर्नादेत्त से मिलती थी। यह कहना था सिस्टर कोरोना का, जिन्होंने माता बेर्नादेत्त के साथ क्रिसमस और आगमन का समय बिताया है।
कौन है माता बेर्नादेत्त
संत अन्ना धर्म समाज की संस्थापिका माता मेरी बेर्नादेत्त किस्पोट्टा को ईश सेविका घोषित किया गया है। धर्मसंघ की डीएसए सिस्टर लिंडा मेरी वॉन ने 7 नवंबर 2015 को रांची के कार्डिनल तेलेस्फोर पी टोप्पो से माता मेरी बेर्नादेत्त को धन्य संत घोषणा का निवेदन किया था। 14 अगस्त 2016 धर्माध्यक्ष बंधुओं ने पवित्र माता निर्देश के अनुच्छेद 45-46 के अनुसार सभी प्रक्रिया को पूरा करते हुए ईश सेविका घोषित किया था। उन्होंने कहा कि माता बेर्नादेत्त 55 वर्ष पूर्व हमारे बीच से विदा होकर ईश्वर की गोद में चली गई थीं। माता बेर्नादेत्त ने संत अन्ना की पुत्रियों के धर्मसंघ की स्थापना की।
आज का आगमन काल... विश्वासी क्रिसमस के लिए खरीदते हैं चरनी
क्रिसमस अर्थहीन हो चुकी है : सिस्टर कोरोना
79 वर्षीय सिस्टर कोरोना ने कहा कि लोग अब भी चरनी के लिए पुआल का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन अब नेकी की परंपरा नहीं रही जैसा 1956 के आसपास हुआ करती थी। उन्होंने बताया कि क्रिसमस में सबसे महत्वपूर्ण है चरनी, क्योंकि येसु गोशाले में जन्मे थे। इसको डिपिक्ट करने के लिए चरनी काे बनाया जाता है। इसमें बलाक येसु के जन्म को जीवंत किया जाता है, इसलिए चरनी को मात्र चरनी समझना सही नहीं। इसका निर्माण बिना किसी के अर्थ करना व्यर्थ है।
त्याग और भले काम को कागज में लिखकर होती थी चरनी में प्रार्थना
सिस्टर शांति मनी कहती हैं कि हम आगमनकाल में खुद को आध्यात्मिक तौर पर तैयार करने के लिए त्याग और तपस्या का अभ्यास किया करते थे। इसके लिए माता बेर्नादेत्त हमें कागज दिया करतीं थीं। कहती थीं जिस दिन त्याग और दान का काम करो कागज पर लिखो। उस कागज को क्रिसमस जागरण के दिन चरनी के पास चढ़ाकर प्रार्थना किया करते थे।
माता बेर्नादेत्त के निर्देश से आगमन काल खास तरह से मनाई जाती थी
83 वर्ष की सिस्टर मरिया बताती हैं माता बेर्नादेत्त आगमनकाल को आध्यात्मिक बनाने के खास तरह की आध्यात्मिक रोजरी जिसमें दस दाने होते थे दिया करती थी। कहा था जिस दिन भला काम करो, उस दिन एक मोती को आगे खींचना और फूल गुच्छा तैयार करना। इसके बाद चरनी में प्रार्थना के लिए चढ़ा देना।
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