आमतौर से सुरक्षा, राजनैतिक मूवमेंट और ट्रैफिक में व्यस्त रहनेवाली पुलिस ने राजधानी में कमजोर वर्गों से जुड़े 300 बच्चों की जिम्मेदारी उठा ली है। पुलिस अफसर इन बच्चों की पढ़ाई तो करवा ही रहे हैं, उन्हें पसंद के हिसाब से किसी न किसी हुनर की ट्रेनिंग भी दिलवा रहे हैं। ये ऐसे बच्चे हैं जिनमें से कुछ के सिर पर माता-पिता का साया नहीं है। कुछ ऐसे हैं जिन्हें उनके माता-पिता पालने में सक्षम नहीं है। इस पहल का नतीजा यह हुआ है कि इस साल कई बच्चों ने 12वीं पास कर काॅलेज की पढ़ाई शुरू कर दी है।
खास बात ये है कि सिर्फ रायपुर पुलिस से जुड़े अफसर ही नहीं, डीजीपी डीएम अवस्थी से पूर्व मुख्य सचिव आरपी मंडल समेत समेत कई आला आईएएस-आईपीएस अफसरों ने भी इन बच्चों की मदद के लिए योगदान दिया है। यह पहल श्रीप्रयास संस्थान के नाम से की गई थी लेकिन अब इसका दायरा व्यापक हो रहा है। इस संस्थान के संस्थापक महेश नेताम ने बताया कि अलग-अलग थानों में काम कर रहे पुलिसवालों ने ऐसे बच्चों की पहचान की थी, जिन्हें बमुश्किल एक वक्त का भोजन मिलता था। पैसों के लिए कचरा इकट्ठा करते थे, स्कूल नहीं जा रहे थे। तब सोचा कि इन बच्चों के लिए कुछ किया जाए। इसीलिए श्री प्रयास संस्थान बनाया। पहले इन बच्चों को घरों में पढ़ाते थे। जब बच्चे बढ़े तो उन्होंने आदिवासी नागरची समाज से संपर्क किया। उनकी पहल की वजह से समाज ने संतोषीनगर स्थित अपना सामाजिक भवन बच्चों के लिए नि: शुल्क में दे दिया। शुरुआत में 15 बच्चे थे, जो बढ़ते-बढ़ते 300 हो चुके हैं। कई बच्चों के लिए यह भवन हॉस्टल भी बन गया है।
साइकिल और खेल के सामान बच्चों को दिए
महेश नेताम ने बताया कि जैसे-जैसे बच्चों की संख्या बढ़ते गई। उनकी मदद के लिए हर रैंक के अधिकारी भी आते गए है। अन्य फील्ड और विभाग के लोग भी संस्था से जुड़ रहे हैं। बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए अधिकारियों ने अलग-अलग योगदान दिया। इनमें एसएसपी अजय यादव, डीआईजी आरिफ शेख, एसपी प्रफुल्ल ठाकुर, प्रशिक्षु आईपीएस रत्ना सिंह, अंकिता शर्मा समेत कई राजपत्रित अधिकारी और इंस्पेक्टर शामिल हैं। इन अफसरों ने कंप्यूटरों से लेकर गैस-चूल्हा, साइकिल, बर्तन, कपड़ा, किताब, खेल का सामान से लेकर कई तरह की जरूरत की चीजें उपलब्ध कराई गई है। बच्चों को हर महीने घर के लिए राशन भी दिया जा रहा है और भवन में रात का भोजन बनता है। कुछ अफसर इन बच्चों के लिए पीएससी-यूपीएससी की क्लास भी ले रहे हैं। पुलिस भर्ती की ट्रेनिंग भी दी जा रही है।
डांस से लेकर खेल तक
यहां बच्चों को डांस ट्रेनर से लेकर संगीत, खेल, कराटे, कंप्यूटर, सिलाई से लेकर भोजन बनाने और हॉकी, बॉलीबॉल, कबड्डी समेत अन्य खेल की ट्रेनिंग दी जा रही है। दो दर्जन बच्चों ने नेशनल गेम में भी हिस्सा लिया है। यहां बच्चे मिठाई का डिब्बा बनाकर सप्लाई कर रहे हैं। मिट्टी और गोबर का दीया बना रहे हैं तो मास्क बनाने का काम भी उन्होंने अपने हाथों में ले रखा है। संस्थान से निकले दो दर्जन बच्चों को 10-12 हजार रुपए महीने की नौकरी भी मिली है।
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