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12 साल में 72 गुना बढ़ा रकबा जिले का पखांजूर बना मक्का द्वीप

राजेश शर्मा | अभी तक राज्य में मछली पालन के क्षेत्र में अलग पहचान बनाने वाले पखांजूर के नाम एक उपलब्धि जुड़ चुकी है। जिले में पहले केवल पारंपरिक रूप से धान की ही फसल ली जाती थी। धान को अब सरकार भी प्रोत्साहन नहीं दे रही है क्योंकि इसमें पानी अधिक लगता है और इसे खरीदने में सरकारी खजाना भी खाली होता जा रहा है। इसी बीच पखांजूर क्षेत्र के किसान जिले में मक्का क्रांति ले आए हैं।वर्तमान में पखांजूर मक्का द्वीप बन चुका है।
हर साल मक्का का रकबा बढ़ता जा रहा है। पखांजूर के किसानों से प्रेरित होकर जिले के बाकी तहसीलों के किसान भी अब इसे अपना रहे हैं। पिछले 12 सालों में ही जिले में मक्का का रकबा 72 गुना बढ़ चुका है। यही कारण है कि सौ करोड़ रुपए की लागत से पखांजूर में मक्का प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करने तैयारी भी शासकीय स्तर पर चल रही है। जिले में साल 1996 से पहले तक देसी मक्का सिर्फ शौक के तौर पर किसान खुद के इस्तेमाल के लिए ही लगभग 200 हेक्टेयर में उगाते थे। 1996 में पखांजूर के कापसी में पदस्थ कृषि विभाग के विस्तार अधिकारी आरके पटेल ने पहली बार मक्का के हाईब्रिड बीज से व्यवसायिक खेती करने पीवी-5 के 5 किसानों के लगभग 11 एकड़ खेतों में प्रयोग किया। प्रयोग सफल रहा जिसके बाद विभाग ने इसे प्रोत्साहित करना शुरू किया। 2008 तक जिले में मक्का का रकबा 538 हेक्टेयर तक ही था।
पखांजूर क्षेत्र में मक्का को लेकर असल क्रांति आई और 2009 में रबी व खरीफ सीजन में इसका रकबा 7 गुना बढ़ गया। इसके बाद किसानों ने मक्का को तेजी से अपनाना शुरू किया और इन 12 सालों में मक्का का रकबा 72 गुना बढ़कर 39 हजार 187 हेक्टेयर पर पहुंच चुका है। वर्तमान में मक्का रबी में 22 हजार 30 हेक्टेयर तथा खरीफ में 16484 हेक्टयेर में लिया जा रहा है। जिले में होनेे वाली कुल मक्का फसल में 70 प्रतिशत पखांजूर क्षेत्र के ही किसान लेते हैं।

मक्का फसल का रकबा बढ़ने के ये हैं फायदे
लागत कम आमदनी ज्यादा

एक हेक्टेयर में धान फसल लेने पर 18 से 20 मजदूरों की आवश्यकता पड़ती है लेकिन मक्का फसल में एक हेक्टेयर के लिए आधे से भी कम मात्र 8 से 10 मजदूरों में काम हो जाता है।

धान की अपेक्षा कम पानी
धान में पानी बहुत लगता है। रबी में धान लगाने किसानों को मना किया जाता है। एक हेक्टेयर धान फसल में एक हजार मिमी पानी की जरूरत होती है। इतने ही क्षेत्र में मक्का लगाने पर उससे आधे से भी कम पानी की जरूरत होती है।

आमदनी होती है ढ़ाई गुना
धान की फसल एक हेक्टेयर में किसानों की औसत आमदनी उन्नत कृषि करने पर 65 हजार तक होती है। वहीं मक्का फसल लगाने पर औसत आमदनी 1 लाख 25 हजार तक होती है यानी धान की अपेक्षा ढ़ाई गुना अधिक आय।

बीमारी कम लगती है
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार मक्का फसल में धान की अपेक्षा बीमारी तथा कीट प्रकोप का खतरा बहुत कम होता है। मक्का फसल लगाने से फसल चक्र परिवर्तन होता है जिससे मिट्टी भी उपजाऊ होती है।

व्यापारी खुद आते हैं खरीदने
धान के लिए पहले पंजीयन कराओ, फिर टोकन कटाओ, फिर धान लेकर खरीदी केंद्र पहुंचो। कई बार किसानों को दो से तीन रात धान खरीदी केंद्र में ही गुजारनी पड़ती है। धान बिक भी गया तो भुगतान नगद नहीं मिलता। मक्का का भी सरकार ने समर्थन मूल्य घोषित करते खरीदी केंद्र बनाए हैं लेकिन बाजार में ही अच्छी कीमत मिलने के कारण किसान सरकारी खरीदी केंद्रों में नहीं जाकर बाजार में ही मक्का बेच देते हैं। सबसे बड़ा फायदा यह की व्यापारी किसानों के खेतों तक पहुंच मक्का फसल खरीद स्वयं परिवहन कर ले जाते हैं।



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Mecca Island becomes Pakanjur in Rakba district in 72 years


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