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मोबाइल न होने से 10% कर रहे थे ऑनलाइन क्लास, अब मोहल्लों में जाकर पढ़ा रहे युवा

राजधानी से लगे धनेली गांव में भी कोरोना के कारण स्कूल बंद हैं और अधिकतर बच्चे मोबाइल न होने से ऑनलाइन क्लास नहीं कर पाते हैं। सिर्फ 10 फीसदी बच्चे ही ऑनलाइन पढ़ाई कर पा रहे हैं। ऐसे में ही गांव के बीई, एमएससी, नर्सिंग के साथ स्नातक पासआउट युवाओं ने एक टोली बनाई और मोहल्ले-मोहल्ले जाकर क्लास लेने लगे।
जुलाई-अगस्त से शुरू हुई यह पहल नियमित रूप से जारी है, जिसमें छात्र से लेकर फैक्टरियों में काम करने वाले युवा शामिल हैं, जो रोज दो समय पहली से लेकर 11 वीं तक के बच्चों की क्लास लेते हैं। इतना ही नहीं पहले खुद ही युवाओं ने पैसा एकत्र किया और बोर्ड, चॉक समेत पढ़ाने के लिए अन्य संसाधन जुटाए। इनकी पहल देख पंचायत की तरफ से भी मदद मिलने लगी। बच्चों के बैठने के लिए दरी, ब्लैक बोर्ड समेत अन्य सामान मिले। अब यहां 150 बच्चे अलग-अलग क्लास में आ रहे हैं। रायपुर से लगा इंडस्ट्रीयल एरिया से जुड़ा हुआ गांव धनेली, यहां भी कोरोना के कारण सरकारी व प्राइवेट स्कूल बंद हैं। स्कूली बच्चों के पास मोबाइल न होने से करीब 10 फीसदी छात्र ही ऑनलाइन माध्यम से पढ़ाई कर पा रहे थे। ऐसे में धनेली के बीई इंजीनियरिंग कर चुके खेमराज साहू, टिकेंद्र साहू व सोहन साहू ने एक पहल शुरू की। खेमराज ने बताया कि बच्चे दिनभर घर के अंदर या बाहर ही खेलते दिखाई दे रहे थे। मार्च से स्कूल बंद होने से उन्हें न तो पता था क्या पढ़ना है। इसे लेकर हमने सोचा कि गांव के स्कूली बच्चों को क्यों न हम सब स्नातक व उससे ज्यादा पढ़ाई किए हुए युवा साथी मिलकर पढ़ाएं। इसे लेकर गांव की सरपंच मनटोरा साहू से भी बात की। उन्होंने भी उन्हें और लोगों को जोड़े के लिए कहा। तीनों ने पहले गांव के युवक-युवतियों को जोड़ने के लिए घर-घर जाकर पढ़ाने के लिए तैयार किया। इससे स्नातक से लेकर नौकरी करने वाले पढ़े-लिखे युवक-युवतियां जुड़ने लगे। टिकेंद्र ने बताया कि पहले तो तीनों ने ही गांव के मंनोरंजन भवन में कुछ बच्चों के साथ सोशल डिस्टेंसिंग व मास्क लगवाकर पढ़ाना शुरू किया। इसके बाद कारवां बनता गया, अब 12 से ज्यादा युवाओं की टीम है, जो इन्हें पढ़ाने आते हैं। कुछ सातों दिन आते हैं तो कुछ अपने काम व नौकरी से समय निकालकर हफ्ते में दो या तीन तीन। हेमंत साहू, सालिकराम जो दोनों फैक्टरी में काम करते हैं, वे भी आते हैं। इसके अलावा एमएससी कर चुकी मातिम निषाद हैं, जो नियमित रूप से पढ़ाने आती है, इसके अलावा धनेश्वरी, आमेश्वरी, रोशनी व योगेश साहू भी मोहल्लों में क्लास लेते हैं।

इस पहल से गांव का हर बच्चा पढ़ रहा है
"स्कूल न लगने से बच्चों की पढ़ाई बंद है, अब सभी के पास मोबाइल तो नहीं है, ऐसे में गांव के पढ़े-लिखे युवा उन्हें नियमित क्लास लगवाकर पढ़ा रहे हैं। मैंने भी कुछ संसाधन उपलब्ध कराए हैं। गांव का हर बच्चा पढ़ाई कर रहा है।"
-मनटोरा साहू, सरपंच, धनेली

11 होनहार बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा उठाने दोस्तों ने बनाया ट्रस्ट, 50 से ज्यादा टॉपर बने
यशवंत साहू . भिलाई | सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले होनहार बच्चों की मदद का जिम्मा भिलाई एजुकेशन चेरिटबल ट्रस्ट ने उठाया है। 2014 से लेकर अब तक 50 से ज्यादा बच्चे स्कूल से लेकर अन्य कंपीटेटिव एग्जाम में टॉपर बने। 150 से ज्यादा बच्चों को एनआईटी, जीईसी और नामी मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिला। यह सब छात्रों की मेहनत के साथ-साथ ट्रस्ट द्वारा मुहैया कराए गए संसाधनों से भी संभव हुआ। इस ट्रस्ट को बीएसपी सीनियर सेकंडरी स्कूल सेक्टर-10 और डीपीएस के 1989 बैच के छात्रों ने बनाया है। ट्रस्ट से जुड़े सभी छात्र अब कॅरियर में सैट है। गरीब बच्चों की मदद और उन्हें कॅरियर में आगे बढ़ने के लिए प्लेटफॉर्म और संसाधन उपलब्ध करा रहे हैं। इस ट्रस्ट की नींव बीएसपी सेक्टर-10 स्कूल और डीपीएस के 1989 बैच के पूर्व छात्रों ने रखी है। इनमें जूही शुक्ला, अभय पांडेय, राजकुमार सिंघल और एस. सजीव प्रमुख ट्रस्टी है। इनमें से अभय ने दो साल पहले ही आईआईटी मुंबई को 10 करोड़ रुपए दान किए थे। राजकुमार सिंघल बैंक ऑफ अमेरिका के एक्स कंट्री एक्जीक्यूटिव रह चुके हैं।

अब हांगकांग में कंपनी के को-फाउंडर है। वहीं पूर्व महाधिवक्ता कनक तिवारी की बेटी जुही शुक्ला सिंगापुर से भिलाइयंस की मदद कर रही हैं। एस. सजीव का रिसाली में अपना स्कूल है। ट्रस्ट के ईपी रितेश ने बताया कि ट्रस्ट से बीएसपी के अधिकारी सौरभ सिन्हा, उपभोक्ता फोरम की पूर्व अध्यक्ष मैत्रीय माथुर, रत्नाकर राव, अभय जायसवाल, शंकराचार्य विद्यालय के प्राचार्य राजकुमार शर्मा और विल्सन मेनन समेत अन्य लोग जुड़े हैं।



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राजधानी से लगे धनेली में लगती क्लास।


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