विशेष प्रजाति के मुर्गे कड़कनाथ का जीआई टैग भले ही दंतेवाड़ा को न मिला हो लेकिन यहां बड़े पैमाने पर हो रहा प्रोडक्शन अब दूसरे प्रदेशों की कम्पनियों को आकर्षित कर रहा है। इसका अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां के 10 किसानों के पोल्ट्री फॉर्म से कड़कनाथ की पहली खेप 1060 मुर्गों को लेकर अंबाला की किंग कड़कनाथ कम्पनी रवाना हो गई। कलेक्टर दीपक सोनी के हाथों साढ़े 4 लाख से ज़्यादा की राशि इन 10 किसानों को मिली और धनतेरस का दिन दंतेवाड़ा में कड़कनाथ पालन करने वाले 10 किसानों के लिए बेहद शानदार हो गया।
धनतेरस के दिन साढ़े 4 लाख से ज्यादा की रकम मिलने पर किसान बेहद खुश हुए। वे बोल पड़े कि प्रशासन की मदद से कड़कनाथ का सबसे बड़ा बाजार हमें मिला है।कलेक्टर दीपक सोनी ने सभी को बधाई दी और कहा कि ये अभी सिर्फ शुरुआत है। दंतेवाड़ा के किसानों, ग्रामीणों के लिए रोजगार के और भी बड़े प्लान हैं।उत्पादों को बाज़ार दिलवा रहे हैं।इससे आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत होगी। कलेक्टर ने ये भी कहा कि अभी कड़कनाथ की सप्लाई अंबाला हो रही है और भी एजेंसियां संपर्क में हैं। कड़कनाथ की पहली खेप अंबाला रवानगी के वक़्त ज़िला पंचायत अध्यक्ष तूलिका कर्मा, सदस्य सुलोचना कर्मा, ज़िला पंचायत सीईओ अश्वनी देवांगन, सहित अन्य अफ़सर मौजूद थे।
केवीके के अलावा मुरकी में भी होगी हैचिंग यूनिट
कड़कनाथ पालन के लिए चूजों की बड़ी समस्या से जूझना पड़ रहा था। कलेक्टर ने बताया कि अब किसानों को कड़कनाथ के चूजों की समस्या भी नहीं होने देंगे। केवीके में हैचिंग यूनिट है। यहां से तो चूज़े सप्लाई होते ही हैं। लेकिन मुरकी में भी बड़ी हैचिंग यूनिट स्थापित होगी। सिर्फ कड़कनाथ बर्ड्स ही नहीं बल्कि दूसरे ज़िलों व राज्यों में चूज़े भी सप्लाई करेंगे।
लॉकडाउन में स्थिति खराब हो गई थी
दंतेवाड़ा के जिन कड़कनाथ पालकों की पहली खेप खरीदकर अंबाला भेजी गई है उनमें दंतेवाड़ा शहर से लेकर नक्सलगढ़ गांव बड़े गुडरा तक के किसान हैं। हलबारास के सुरेंद्र कुमार व विमला बघेल को सबसे ज़्यादा 72000 रुपये कड़कनाथ मुर्गा बेचने के बाद एकमुश्त मिले हैं। बड़े गुडरा के विजय सिन्हा को 66400, पोडिया लखमा को 13200, कटेकल्याण की निर्मला जायसवाल को 38400 रुपए मिले हैं। कड़कनाथ पालन के लिए दंतेवाड़ा की पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष कमला नाग भी पीछे नहीं हैं। धनतेरस के दिन कड़कनाथ बेचकर 61600 रुपए एकमुश्त कमाए हैं। बताया कि कड़कनाथ का पालन तो कर रहे थे, लेकिन मार्केट की सबसे बड़ी समस्या थी। कई मुर्गे मर जाते तो कई को चिल्हर में बेचना मजबूरी थी।
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