कोल्हू के बैलों की मदद से तेल निकालने के बारे में तो आपने सुना होगा। वैसे तो इसका चलन अब बंद हो गया है लेकिन रांची में आज भी एक जगह है, जहां कोल्हू से तेल निकालने का सिलसिला जून 1938 से अब तक जारी है। फर्क सिर्फ इतना है कि तेल निकालने के लिए बैलों की जगह मोटर का इस्तेमाल किया जाने लगा है। शहीद चौक से कचहरी जाने वाली सड़क पर थोड़ा आगे बढ़ते ही आपको एक मकान में कोल्हू दिख जाएगा।
शुद्ध सरसों का तेल लेने यहां कई लोग आते हैं। शहर के बीचों-बीच स्थित यह जगह इतनी मंहगी है कि यहां शॉपिंग मॉल खोलकर करोड़ों का मुनाफा कमाया जा सकता है। इसके बावजूद कोल्हू का संचालन कर रहे उपेंद्र साहू को इसका मलाल नहीं। कहते हैं यह गांधी प्रेम है। उनके वचन का पालन करने की प्रतिबद्धता है। इसका मालिकाना हक रांची के प्रमुख गांधीवादी स्व. श्याम किशोर साहू के परिवार के पास है। श्याम किशोर साहू और उनकी पत्नी सावित्री देवी ने महात्मा गांधी की प्रेरणा से जून 1938 में रांची में ग्राम उद्योग भंडार की शुरुआत की।
गांधीजी ने दी थी आशीष पंक्ति
1940 में गांधीजी जब रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन के लिए रांची आए तो यहां भी पहुंचे। ‘इस भंडार की उन्नति हो।’ आशीष पंक्ति लिखकर नीचे अपने हस्ताक्षर किए। यह आज भी भंडार की दीवार पर टंगे फ्रेम में सुरक्षित है। साथ में बापू ने कहा था, कोल्हू को कभी बंद मत करना। तब से आज तक कोल्हू बंद नहीं हुआ।
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