ठाकुरराम यादव | राजधानी की 200 से ज्यादा अवैध कालोनियों को पिछले चार साल में वैध किया गया और इस तरह वहां निर्माण के लिए नक्शे पास होने का सिलसिला शुरू हुआ। लेकिन आउटर की ज्यादातर ऐसी कालोनियों में निगम के विकास शुल्क और अधोसंरचना के नाम पर बिजली कनेक्शन के भारी-भरकम शुल्क ने मकान बनाने वालों की कमर तोड़ दी है। आउटर के तीन वार्डों में ही ऐसे 200 से ज्यादा मामले हैं, जिनमें लोगों ने निगम को विकास शुल्क के तौर पर (हजार वर्गफीट मकान के लिए) 60 से 65 हजार रुपए अदा कर दिए। विकास शुल्क का आशय यही है कि निगम यहां सड़क, बिजली और पानी की अधोसंरचना इसी पैसे से उपलब्ध करवाएगा। लेकिन जब इतना शुल्क अदा करने के बाद लोग घरेलू बिजली कनेक्शन के लिए आवेदन कर रहे हैं, तो उनसे भी 45 हजार रुपए से अधिक शुल्क मांगा जा रहा है। तर्क यह दिया जा रहा है कि इससे बिजली विभाग खंभे-ट्रांसफार्मर जैसी अधोसंचरना विकसित करेगा। इस तरह, इन कालोनियों में नक्शा पास करवाने और बिजली कनेक्शन लेने में ही लोगों के लगभग एक लाख रुपए खर्च हो रहे हैं। सामान्य तौर पर एक किलो वाट के लिए 2300 रुपए शुल्क तय है।
राजधानी की अवैध कालोनियों को राज्य सरकार ने नियमितीकरण कानून लाकर 2016 से नियमित करना शुरू किया था, ताकि वहां प्लाट खरीद चुके लोगों को नुकसान न उठाना पड़े। अधिकांश कालोनियां कृषि जमीन पर बिना डायवर्सन और लेआउट के खड़ी कर दी गईं। इस वजह से यहां वर्षों तक लोगों के मकान के नक्शे ही पास नहीं हुआ। चार साल पहले आए कानून के जरिए निगम ने इन कालोनियों को नियमित करते हुए अपने लेआउट प्लान में शामिल कर लिया है। इसलिए यहां के सारे लोग निगम से नक्शा पास करवाकर मकान बनाने लगे हैं। लेकिन भारी-भरकम शुल्क वसूली भारी पड़ रही है।
इसलिए दे रहे दोहरा चार्ज : भास्कर ने ऐसी दर्जनभर कालोनियों की पड़ताल की। वहां के लोगों ने बताया कि औसतन हजार फीट के मकान का नक्शा पास करने के लिए उनसे डेवलपमेंट चार्ज यानी विकास शुल्क के नाम पर 60-70 हजार रुपए लिए गए हैं। निगम अफसरों ने बताया कि डेवलपमेंट चार्ज मुख्य रूप से संबंधित इलाके या कालोनी में बिजली, सड़क, नाली पानी इत्यादि की सुविधाएं विकसित करने के लिए ली जाती है। इसे लेने के बाद संबंधित कालोनी में बिजली खंबे लगाने, सड़क, नाली और पाइपलाइन बिछाने की जिम्मेदारी निगम की हो जाती है। लेकिन जब यही लोग नक्शा पास करवाने के बाद बिजली कनेक्शन के लिए आवेदन कर रहे हैं तो बिजली कंपनी भी उनसे 46 हजार रुपए तक चार्ज ले रही है। चार्ज इसी आधार पर लिया जा रहा है कि कनेक्शन देने के लिए खंभे लगाने से लेकर सारी अधोसंरचना विकसित करनी होगी। इसका नतीजा यह हुआ है कि प्लाट खरीदने और मकान बनवाने तक लोगों के एक लाख रुपए अतिरिक्त खर्च हो रहे हैं।
नियम ऐसा कि बोझ बढ़े
विद्युत विनियामक आयोग ने कालोनियों के संबंध में यह नियम 2008 में लागू किया था। इस नियम के अनुसार अवैध कालोनी में अगर लोग रहने लगें तो वहां कंपनी को बिजली सप्लाई के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करना पड़ता है। इसकी लागत वहीं के लोगों से वसूली जानी है। न्यूनतम वर्गफीट क्षेत्र और कंस्ट्रक्शन के आधार पर रेट तय हैं। कनेक्शन डिमांड नोट के आधार पर देना है।
जोन-6 में सैकड़ों मामले
निगम और बिजली कंपनी के अपने-अपने नियम और दावों के बीच लोगों पर विकास शुल्क और कनेक्शन का बोझ खासा बढ़ गया है। जोन-6 की अध्यक्ष निशा देवेंद्र यादव ने कहा कि उनके जोन में ऐसे मामले ज्यादा हैं, क्योंकि ऐसी कालोनियां आउटर में ही हैं। यदि कोई व्यक्ति विकास शुल्क अदा करके नक्शा पास करवा लेते है, तब बिजली कंपनी को सामान्य शुल्क पर कनेक्शन देना चाहिए।
अध्यक्ष ने कहा कि ऐसे लोग उनके पास आवेदन करें, ताकि निगम से प्रस्ताव बनाकर कंपनी को अतिरिक्त शुल्क लेने से रोका जा सके।
"अवैध कालोनी या जिनका हालफिलहाल में नियमितीकरण हुआ है वहां सप्लाई कोड के नियम के मुताबिक तय भार स्वीकृत किया जाता है। इसका तय शुल्क भुगतान करना होगा।"
-एके लखेरा, एसई, बिजली कंपनी
"ले आउट में शामिल कालोनियों से डेवलपमेंट चार्ज लिया जाना जरूरी है। तभी तो कालोनी में सुुविधाएं विकसित की जा सकती हैं। बिजली का मामला शासन स्तर का है।"
-बीआर अग्रवाल, नगर निवेश ननि
Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today
from Dainik Bhaskar https://ift.tt/37L7Eci
via
Comments
Post a Comment