राजधानी रायपुर में 7 माह में कई परंपराएं कोरोना की भेंट चढ़ चुकी हैं। अब महामारी ने बंगाली समाज की सदियों पुरानी परंपरा तोड़ दी है। वो ऐसे कि गुरुवार को नवरात्रि की षष्ठी तिथि से बंगाली समाज की दुर्गा पूजा शुरू हो रही है, लेकिन इस बार समाज प्रदेश में कहीं भी दुर्गा प्रतिमा की स्थापना नहीं कर रहा है। दशमी को सिंदूरखेला का सामूहिक कार्यक्रम भी नहीं करने का फैसला लिया गया है। इधर, प्रदेशभर के देवी मंदिरों में अष्टमी का भोग भंडारा भी रद्द कर दिया गया है।
रायपुर में भी बंगाली समाज डेढ़ सौ साल पहले से दुर्गा पूजा कर रहा है। बंगाली कालीबाड़ी समिति के अध्यक्ष सूर्यकांत सूर और सिटी महाकालीबाड़ी के अध्यक्ष दीप्तेश तरुण चटर्जी ने बताया कि शहर में 22 जगहों पर बंगाली समाज दुर्गा पूजा उत्सव मनाता है। इस बार कहीं भी प्रतिमा की स्थापना नहीं की जा रही है। इसकी जगह केवल घट स्थापना की जाएगी। यहां भी सबको प्रवेश नहीं दिया जाएगा। सुबह फिजिकल डिस्टेंसिंग के साथ भक्त आरती में शामिल होंगे। उन्होंने बताया कि दशमी तिथि को सिंदूरखेला की परंपरा निभाई जाती है जिसमें सिंदूर लगाकर माता को विदाई दी जाती है। इसके बाद महिलाएं भी एक-दूसरे को अखंड सौभाग्य के लिए सिंदूर लगाती हैं। संक्रमण को देखते हुए सिंदूरखेला का सामूहिक कार्यक्रम नहीं होगा। भक्तों द्वारा माता को सिंदूर लगाने को लेकर फिलहाल फैसला नहीं हुआ है। इस पर फैसला 24 अक्टूबर को होगा।
इस बार नहीं होगा धुनुची नृत्य, पुष्पांजलि भी बिना फूलों की
त्रिलोकी कालीबाड़ी के सचिव विवेक वर्धन और शिव दत्ता ने बताया कि बंगाली समाज के लोग कलश लेकर अपने आसपास के तालाबों में जुटे। यहां पूजा-पाठ कर कलश में पानी भरा गया। षष्ठी तिथि को इसी कलश के ऊपर घट स्थापना की जाएगी। इसका विसर्जन दशमी तिथि को किया जाएगा। उन्होंने बताया कि कोरोना के चलते दुर्गा पूजा के आयोजन में इस बार कई बदलाव किए गए हैं। सामूहिक धुनुची नृत्य नहीं होगा। पुष्पांजलि भी बिना फूलों के होगी। पुष्पांजलि के दौरान सिर्फ प्रणाम मंत्र बोला जाएगा। बच्चों और बुजुर्गों के प्रवेश पर रोक रहेगी।
छठवें दिन से इसलिए दुर्गा पूजा करता है बंगाली समाज
महिषासुर नामक असुर से देवताओं ने 10 दिन तक युद्ध किया था। पहले चार दिन लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिकेय और गणेश ने युद्ध किया, लेकिन वे उसे परास्त नहीं कर सके। पांचवें दिन ब्रह्मा-विष्णु और महेश ने शक्ति का आह्वान किया जिसके बाद दुर्गा देवी प्रकट हुईं। छठवें दिन से उनका और महिषासुर का युद्ध शुरू हुआ। यही वजह है कि बंगाली समाज छठवें दिन से दुर्गा पूजा करता है। दशमी को माता ने महिषासुर का वध किया था। इसी दिन शाम को सिंदूरखेला की रस्म निभाकर देवी को विदाई दी जाती है।
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