महानदी के पानी के उपयोग को लेकर ओडिशा और छत्तीसगढ़ में 37 साल पुराने विवाद पर शनिवार को जस्टिस एएम.खानविलकर की अध्यक्षता वाले फुल ट्रिब्यूनल ने सुनवाई की। इसमें दो अन्य जज डा,रविरंजन और हरसिमरत कौर सदस्य हैं। आज की सुनवाई में छत्तीसगढ़ के पैरोकारों ने अपना पक्ष पूरी दमदारी से रखा। राज्य सरकार ने तर्क दिया कि हीराकुंड में 60 हजार एमसीएम पानी है। यदि राज्य को 36 हजार एमसीएम पानी मिले तो पैरी, अरपा और गंगरेल की जरूरत को पूरा किया जा सकता है।
इसके अलावा खारंग के पूरा होने पर 10 हजार एमसीएम पानी का उपयोग हो सकता है। सीएम बघेल छत्तीसगढ़ के हिस्से का पूरा पानी हासिल करने पर काम कर रहे हैं। उन्होंने अफसरों से कहा है कि वे अपना पक्ष पूरी मजबूती से रखे। शनिवार की सुनवाई के बाद ट्रिब्यूनल ने पांचों राज्यों को एक प्रश्नावलियों का एक प्रपत्र भेजकर 37 दिनों के भीतर जबाव मांगा है। मामले की सुनवाई अब 7 नवंबर को होगी। सुनवाई ऑनलाइन वीसी के जरिए हुई। बता दें कि महानदी कछार पांच राज्यों छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और झारखंड के बीच है।
लेकिन महानदी के कैचमेंट एरिया का 53 प्रतिशत छग में और 46.5 प्रतिशत ओडिशा में है। इसलिए महानदी को छत्तीसगढ़ की जीवन रेखा भी जाता है। राज्य में खेती- किसानी से लेकर उद्योग और अर्थव्यस्था में इसकी महती भूमिका है, लेकिन हीराकुंड बांध से छत्तीसगढ़ को न पानी मिल रहा है और न ही बिजली। महानदी का यह विवाद सबसे पहले 1983 में शुरू हुआ। 2016 में ओडिशा सरकार इस मामले को लेकर कोर्ट में चली गई। 2017 में यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। वहां से ट्रिब्यूनल में भेजा दिया गया। जहां दो साल से इसकी सुनवाई चल रही है।
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