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पैरा जलाने से कैंसर जैसे गंभीर रोग भी हो सकते हैं, प्रशासन ने कहा-किसान बिल्कुल न जलाएं

पैरा जलाने से फेफड़ों की बीमारियों के साथ ही सांस लेेने में तकलीफ व कैंसर जैसे विभिन्न रोग होने की संभावना होती है। यहीं वजह है कि खेतों में पैरा नहीं जलाने का आग्रह प्रशासन ने किया है। पिछले वर्षों में यह देखने में आया कि किसान फसल कटाई के बाद पैरा या अवशेष को खेत में जला देते हैं। खेतों में फसल कटाई के पश्चात जो अवशेष बच जाते हैं उसे जलाने से पर्यावरण को बहुत नुकसान होता है जिसे रोकने के लिए कड़े उपाय किए जाने की आवश्यकता को देखते हुए इस संबंध में प्रशासन ने निर्देश जारी किए हैं। अधिकारियों ने किसानों से आग्रह किया है कि अवशेष को जलाने से बेहतर है कि अवशेष स्थानीय विधि से यूरिया का स्प्रे कर खाद बना लिया जाए। खुले में भी खाद बनाया जा सकता है। गड्‌ढे में पैरा का वेस्ट डीकम्पोजर से और ट्राईकोडरमा का उपयोग कर भी खाद बनाया जा सकता है। फसल अवशेष को मिट्टी में मिलाए। स्ट्रा चोपर हे-रेक, स्ट्रा बेलर का प्रयोग करके अवशेष की गांठे और आमदनी बढ़ाई जा सकती है। जीरा ड्रील रोटावेटर, रीपर बाईन्डर व अन्य स्थानीय उपयोगी व सस्ते कृषि यंत्रों को भी फसल अवशेष प्रबंधन के लिए अपनाया जा सकता है।



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