प्रदेश में धर्मांतरित आदिवासियों के जाति प्रमाण पत्र सरकार निरस्त नहीं करेगी। भाजपा नेता व पूर्व विधायक युद्धवीर सिंह जूदेव ने यह मांग सरकार से की थी। इसे राज्य सरकार ने खारिज कर दिया है। जूदेव से कहा गया है कि अनुसूचित जनजातियों के निर्धारण एवं उनकी पात्रता का प्रावधान संसद द्वारा निर्धारित किया गया है। इसमें किसी भी प्रकार के संशोधन के अधिकार संसद को ही है।
आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग ने जूदेव को लिखे पत्र में कहा है कि वर्तमान में राज्य सरकार द्वारा प्रचलित नियमों के आधार पर कार्यवाही की जा रही है। इस वजह से आप केंद्र सरकार से संपर्क कर सकते हैं। इस संबंध में राज्य सरकार कार्रवाई के लिए अधिकृत नहीं है। विभाग के उप सचिव एसके दुबे ने पत्र जारी किया है। जूदेव की मांग के खिलाफ आदिवासी उरांव समाज हरकत में आ गया। छत्तीसगढ़ कैथोलिक उरांव समाज ने सीएम भूपेश बघेल को चिट्ठी लिखी। इसमें जूदेव की मांग को अवैधानिक बताते हुए तत्काल खारिज करने का आग्रह किया गया। समाज के अध्यक्ष दीपक एक्का, उपाध्यक्ष नीलम टोप्पो व ब्लासियुस एक्का तथा सचिव अजय कुमार लखड़ा ने सीएम को बताया कि संविधान में प्रावधान है कि आदिवासी किसी भी धर्म का अनुयायी हो सकता है।
आदिवासियों के मूलधर्म को पद्मश्री डॉ. रामदयाल मुंडा ने आदि धर्म कहा है।
1951 के पूर्व की जनगणना में आदि नाम दिया गया है। सदियों पहले कुछ आदिवासियों के पूर्वजों ने स्वेच्छा से ईसाई धर्म अपनाया। वर्तमान में उनकी तीसरी-चौथी पीढ़ी यह धर्म मान रही है। सुप्रीम कोर्ट का भी निर्णय है कि मात्र धर्म परिवर्तन से एक व्यक्ति अनुसूचित जनजाति की सदस्यता से वंचित नहीं रह सकता।
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