यदि आप सरकारी अधिकारी-कर्मचारी हैं तो कृपया बीमार न पड़ें या भगवान से प्रार्थना करें कि आपको कोई रोग न हो। वरना आपको छुट्टी तो मिल जाएगी, लेकिन आप महीनों-महीनों वेतन के लिए तरस जाएंगे। यहां तक कि आपकी जमा पूंजी भी खर्च हो जाएगी। एक गलत नियम की वजह से हजारों कर्मचारी परेशान रहते हैं। जब आपको पैसे की जरूरत रहती है तभी आपका विभाग तनख्वाह तो रोक ही देता है, इसके बाद बिल रीइंबर्समेंट के लिए महीनों चक्कर लगवाता है।
लगातार ऐसे मामले सामने आने के बाद भास्कर ने इस पर पड़ताल की। इसमें यह बात सामने आई कि बीमारी में अवकाश स्वीकृत होने पर ही वेतन भुगतान का वित्त संहिता एवं अवकाश नियम में प्रावधान है। इसे संशोधित कर रीइंबर्समेंट हो किंतु वास्तविक खर्च का लगभग 75 प्रतिशत ही मिलता है। करीब 25 फीसदी तक कटौती हो जाती है।
कलेक्टोरेट में 750-800 पीड़ित
रायपुर समेत प्रदेश के सभी जिलों में करीब 750-800 ऐसे कर्मचारी हैं जो किसी न किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं। उन्हें भी अपनी तनख्वाह व मेडिकल बिलों के पैसों के लिए चक्कर काटने पड़ते हैं। यदि किसी की विभाग में पहुंच और संबंध है तो उनके मजे हैं। क्योंकि ऐसे कर्मचारियों को समय-समय पर इलाज के पैसे मिलते रहते हैं। जबकि सीधे-सादे कर्मचारियों की चप्पलें घिस जाती हैं। ज्यादातर कर्मचारियों का मानना है कि इस मामले में भ्रष्टाचार निचले स्तर पर ज्यादा है। बिना परसेंटेज दिए काम नहीं होता।
मेडिकल भत्ते का आप्शन
तृतीय-चतुर्थ वर्ग के कर्मचारियों को 250 रुपए मेडिकल भत्ता हर महीने मिलता है। इसके लिए उन्हें आप्शन देना होता है कि वे हर महीने ये राशि लेंगे या नार्मल कोर्स में 3000 रुपए रीइंबर्समेंट कराना चाहते हैं। रीइंबर्समेंट में फायदा है कि बिल 3000 से अधिक होता है तब भी भुगतान मिल जाता है।
कैशलेस स्कीम लागू करें
कर्मचारी संघ के प्रांताध्यक्ष विजय झा, शिक्षाकर्मी मंच के विवेक दुबे समेत अनेक नेताओं ने कहा कि इसके बदले कैशलेस स्कीम प्रारंभ की जा सकती है। जितनी राशि मरीज को इलाज के बाद मिलती है उतनी राशि अस्पतालों को भुगतान कर दी जाए, जैसे मेडिकल बीमे में होता है।
विशेषज्ञ की राय
- पूर्व एसीएस बीकेएस रे के मुताबिक नियमों में खोट नहीं है। जरूरत है उसका पालन कैसे किया जाता है। इलाज के वास्तविक केस में वरिष्ठ अफसरों को सहानुभूतिपूर्वक तत्काल निर्णय लेना चाहिए। विशेष परिस्थिति में उन्हें संवेदनशील होना चाहिए। विलंब का मतलब है मैनुपुलेट करना।
- जीएडी सचिव डीडी सिंह का कहना है कि नियमों के अनुसार जो जानकारी मांगी जाती है या जो प्रकिया है उसमें कमी नहीं है। जिनका लगातार इलाज चलता है उन्हें दिक्कत नहीं होती। कभी-कभार बीमार पड़ने वालों को सिस्टम फालो करने में परेशानी होती है। फिर भी कोई अच्छा विकल्प हो तो सुधार किया जा सकता है।
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