ऐतिहासिक जशपुर दशहरा उत्सव के सातवें दिन वन दुर्गा और 64 योगनियों को नगर प्रवेश कराया गया।
षष्ठी की शाम को शहर के काली मंदिर से राजपुरोहित और बैगा रियासत कालिन सैनिकों के साथ पूरे नगाड़ों की थाप से 4 किलोमीटर की नंगे पैर पदयात्रा कर वन दुर्गा और योगनियों को नगर प्रवेश के लिए निमंत्रण देकर आए थे। सप्तमी की सुबह राजपुरोहित और बैगा वनदुर्गा और योगनियों को नगर लाने के लिए पहुंचे। यहां राजपुरोहितों ने विधि विधान से वन दुर्गा की पूजा और हवन कर उन्हें बेल में स्थापित किया। गांव के बैगा ने इस बेल और पीपल के संयुक्त वृक्ष से उतार कर चांदी की थाल में राजपुरोहित को सौंपा। उसके बाद राजपुरोहित इस थाल में लेकर वन दुर्गा और योगनियों नगर की ओर रवाना हुए। बेलवरण पूजा स्थल से काली मंदिर तक तकरीबन 4 किलोमीटर की दूरी को नंगे पैर पुरोहित व बैगा का दल द्वारा बिना रुके तय करना होता है। इस दौरान किसी भी स्थिति में वन दुर्गा व योगनियों के थाल को ना तो रोका जा सकता है और ना ही जमीन में रखा जा सकता है। राजपुरोहित विनोद मिश्रा, रजत मिश्रा, अनुज मिश्रा ने बताया कि बेलवरण पूजा की परंपरा दशकों से चली आ रही है। जिसे आज भी उसी उत्साह एवं परंपरा के साथ मनाया जाता है। लेकिन इस बार कोरोना संक्रमण को लेकर कुछ सावधानियां बरति जा रही है।
पंडालों में विराजमान हुईं मां दुर्गा प्रतिमा
सप्तमी के मौके पर शहर के श्रीहरि कीर्तन भवन और दरबारी टोली देवी मंडप पर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की गई। दोनों स्थानों पर भव्य पंडाल बनाए गए हैं, पर श्रद्धालुओं की भीड़ के लिए इस वर्ष कोई इंतजाम नहीं किए गए हैं। दरबारीटोली दुर्गा मंडप पर सजावट सिर्फ मां दुर्गा की प्रतिमा के पास किया गया। श्री हरि कीर्तन भवन में ऐसा पंडाल में ऐसा गेट बनाया गया है कि एक वक्त पर सिर्फ दो लोग ही पंडाल के भीतर प्रवेश कर सकें। पंडाल में कोरोना गाइडलाइन का पालन किया जा रहा है।
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