कांस के फूलों को मानसून की विदाई का संकेत माना जाता है। श्री रामचरितमानस की पंक्ति विगत शरद रितु आई, देखहूं लक्ष्मण परम सुहाई, फूले कास सकल मही छाई, जनु बरसा कृत प्रकट बुढा़ई “में भी इसका उल्लेख है। इसका अर्थ है कि बारिश अब बूढ़ी हो चुकी है। आमतौर पर कांस के फूल खाली जमीन पर खुद ही उग जाते हैं। यह कहीं भी एक साथ इतने अधिक मात्रा में नहीं पाए जाते हैं। 15-20 पौधों की झुंड में निश्चित दूरी पर इन्हें देखा जा सकता है, पर जशपुर जिले के कई इलाकों में यह एक स्थान पर इतने अधिक मात्रा में उगे हुए हैं कि मानो इसकी खेती की गई हो। यह तस्वीर मरगा एनीकट जाने वाले रास्ते में ली गई है। पूरे इलाके में दूर-दूर तक उगे कांस के फूल से ऐसा लग रहा है, मानो धरती ने सफेद चादर ओढ़ ली हो। पहाड़ों की हरियाली के बीच सफेद धरती का मनमोहक दृश्य देखते ही बन रहा है।
गन्ने की प्रजाति है कांस
कांस एक तरह की गन्ने की प्रजाति है। इसका वैज्ञानिक नाम वाइल्डशुगरकेन है। यह एक ऐसा पौधा है जिसे जानवर भी नहीं खाते और यह स्वत: ही खाली जमीन पर उग आते हैं। पुराने जमाने में कांस के फूलों से गद्दा बनाने का काम किया जाता था, पर अब इसकी उपयोगिता भी नहीं रह गई है।
अभी और बारिश की उम्मीद
भले ही जगह-जगह कांस के फूल उग आए हो पर अभी भी जिले में और बारिश की उम्मीद बनी हुई है। हालांकि अब तक जिले में 10 साल की औसत से कहीं अधिक बारिश हो चुकी है। जिले में अब तक 1148.3 मिमी औसत वर्षा हो चुकी है जब कि जिले में इस अवधि में बीते 10 वर्षों का औसत 810.9 मिमी है।
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