पितृ पक्ष की चतुर्दशी तिथि बुधवार को मनी। 17 सितंबर यानि आज सर्व पितृ अमावस्या श्राद्ध पक्ष का अंतिम दिन है। बुधवार को चतुर्दशी का श्राद्ध किया गया। ज्योतिषाचार्यों ने बताया कि देव पंचांग के अनुसार सर्व पितृ अमावस्या का तर्पण 17 सितंबर को करना ही श्रेयस्कर होगा। इसे लेकर लोगों में भ्रम की स्थिति सामने आ रही थी। मंगलवार को रात 11 बजे के बाद से चतुर्दशी तिथि आरंभ हुई, जो कि बुधवार को शाम 7:56 मिनट तक रही। फिर रात्रि 7:56 से अमावस्या तिथि प्रारंभ होकर गुरुवार को शाम 4:29 तक रहेगी। इसलिए पूर्ण अमावस्या की तिथि गुरुवार को ही होगी। बता दें कि बीते कुछ समय से तिथियों को लेकर लोगों में भ्रम की स्थिति देखने को मिल रही थी, लेकिन तिथियों में कोई बदलाव नहीं है।
गायत्री परिवार ने श्राद्ध तर्पण की विधि सोशल माध्यम में शेयर की
गायत्री परिवार ने परिजनों के साथ ही लोगों के लिए श्राद्ध तर्पण की पूरी विधि सोशल माध्यम पर शेयर की है। इसमें बताया गया है कि अपने घर पर रहते हुए हम किस तरह से श्राद्ध तर्पण कर सकते हैं। गायत्री परिवार के द्वारिका प्रसाद पटेल ने बताया कि गायत्री तीर्थ शांतिकुंज हरिद्वार ने पूजन की पूरी विधि जारी की है। सर्वप्रथम पितृ पूजन की तैयारी में 2 खाली पतीला, अक्षत, पुष्प, माला, जनेऊ, रक्षा सूत्र, रोली, कुशा, दूध, दही, शहद, काला तिल, जौ का आटा या फिर आटा आदि सामान की तैयारी करके रखें। जिन परिजनों के पास पूजा सामग्री उपलब्ध न हो, वे भावनात्मक रूप से अपने पितरों का ध्यान करके जल और पुष्प के साथ कर सकते हैं।
लोग घर में ही कर रहे हैं
इस बार कोरोना संक्रमण के चलते पितृ पक्ष पर लोग घरों में ही श्राद्ध, पूजन कर रहे हैं। हर साल शहर में गायत्री परिवार भी अपने मंदिर में श्राद्ध तर्पण का आयोजन करवाता रहा है। इसके साथ ही शहर में अन्य संस्थाओं के द्वारा भी श्राद्ध तर्पण का आयोजन किया जाता रहा है। इस बार कोरोना महामारी के कारण शहर में कोई भी सामूहिक कार्यक्रम नहीं हो रहे।
क्या है पितृपक्ष
ज्योतिषाचार्यों ने बताया कि पितृ पक्ष अपने कुल, परंपरा और पूर्वजों को याद करने और उनके पदचिन्हों पर चलने का संकल्प लेने का समय है। इसमें व्यक्ति का पितरों के प्रति श्रद्धा के साथ अर्पित किया गया तर्पण यानी जलदान और पिंडदान यानी भोजन का दान श्राद्ध कहलाता है। पूर्वजों की पूजा और उनकी तृप्ति के लिए किए गए शुभ कार्य जिस विशेष समय में किए जाते हैं उसे ही पितृपक्ष कहा गया है।
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