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250 एकड़ में लगाए अर्जुन के पौधे में से 80 फीसदी सूख गए, अफसर कागजों पर करते रहे मॉनिटरिंग

दिलीप जायसवाल | बलरामपुर जिले में महिलाओं को रोजगार मुहैया कराने टसर (रेशम) उत्पादन पर 10 करोड़ रुपए से अधिक खर्च कर दिए, लेकिन पूरी योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई। राजपुर इलाके के धंधापुर में 250 एकड़ में टसर उत्पादन के लिए पौधे लगाए थे, लेकिन 4 महिलाओं को भी रोजगार नहीं मिला। यही स्थिति अन्य गांवों की है।
टसर उत्पादन के लिए जहां अर्जुनी के पौधे लगाए गए थे, वहां पूरे इलाके में ठूंठ और मैदान नजर आ रहे हैं। केंद्रीय रेशम बोर्ड ने यह काम एनजीओ को महिला सशक्तिकरण के लिए लाखों रुपए के साथ दिया था। योजना के क्रियान्वयन में लापरवाही बरती गई, जिससे टसर उत्पादन के लिए लगाए गए पौधे देखरेख के अभाव में मर गए। दैनिक भास्कर ने इन इलाकों में जाकर योजना की पड़ताल की तो वहां अर्जुनी के पौधे की जगह ठूंठ नजर आए। धंधापुर में कुछ साल पहले ही 250 एकड़ में अर्जुन के पौधे लगाए गए थे। 15-15 महिलाओं का तीन समूह बनाया गया और पौधरोपण सहित इससे जुड़े कामों पर धंधापुर में 33 लाख से अधिक खर्च किए गए थे, लेकिन हकीकत यह है कि अब इस गांव में महज 20 प्रतिशत पौधे ही बचे हैं। इस एनजीओ को केंद्रीय रेशम बोर्ड से फंडिंग की गई थी।

पौधे लगाने में 33 लाख से अधिक किए खर्च किए, अब सिर्फ 20 प्रतिशत ही पौधे बचे
अब खुद काे ठगा महसूस कर रही हैं महिलाएं

रामचंद्रपुर ब्लाॅक में टसर उत्पादन करने इस प्रोजेक्ट में काम करना था। एनजीओ ने कहा वहां जमीन नहीं मिलने से पौधे नहीं लगा पाए। धंधापुर की महिलाओं ने बताया पौधे लगाते समय उन्हें बड़े सपने दिखाए गए, लेकिन इसके बाद ध्यान नहीं दिया। जहां पौधे बचे हैं, वहां टसर उत्पादन कर बेचा था, लेकिन उसका पैसा नहीं दिया गया, इससे उन्होंने टसर उत्पादन करना बंद कर दिया।

जहां पौधे अच्छे वहीं दिखाने जांच टीम को ले जाते रहे
जब अधिकारियों का दौरा होता है तो एनजीओ द्वारा उन पौधों को दिखाया जाता है, जहां का ग्रोथ अच्छा है, लेकिन जंगल में लगाए गए पौधों को नहीं दिखाया जाता। अधिकारियों की मिलीभगत के कारण एनजीओ से खर्च पैसे का जब भौतिक सत्यापन के साथ हिसाब मांगा जाता है तो फील्ड के हालात से अवगत नहीं कराया जाता है।

निरीक्षण करने गए इंचार्ज जवाब देने से बचते रहे
केंद्रीय रेशम बोर्ड के अंबिकापुर कार्यालय के साइंटिस्ट व इंचार्ज डॉ. जय किशन सिंह ने कहा कि 3 साल पहले जब तक प्रोजेक्ट चला वे टीम के साथ निरीक्षण के लिए जाते थे। हालांकि उन्होंने इसका जवाब नहीं दिया कि उन्हें कितनी बार लापरवाही मिली। हालांकि वे शुरू में इस बात से बचते रहे कि उनके मॉनिटरिंग का जिम्मा नहीं है और ट्रेनिंग देने का ही काम करते हैं।

योजना सफल होती तो 400 परिवारों को मिलता रोजगार
ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने यह बेहतरीन योजना थी, लेकिन इस पर ध्यान नहीं दिया। धंधापुर में ही 250 एकड़ में लगे अर्जुनी पौधों में अगर टसर उत्पादन करते तो 400 परिवार को हर 3 महीने में 10-10 हजार की आय होती। ग्रामीणों ने कहा अब धंधापुर में यह प्रोजेक्ट सफल होता तो अब तक 40 लाख कमा चुके होते, लेकिन जिम्मेदारों ने ध्यान नहीं दिया।

मौके पर जाकर पता करते हैं कि वहां क्या स्थिति है
"किसान महिला सशक्तिकरण के तहत बलरामपुर जिले में प्रदान व आदर्श प्रहरी समाज सेवी संस्था को प्रोजेक्ट दिया था, उनके काम की मॉनिटरिंग के लिए केन्द्रीय रेशम बोर्ड के अफसरों के साथ जाते थे। निरीक्षण रिपोर्ट बोर्ड को भेजते हैं। पौधे मर गए और महिलाओं को रोजगार नहीं मिला है तो गांव जाकर देखते हैं।"
-डॉ. जय किशन सिंह, साइंटिस्ट, केंद्रीय रेशम बोर्ड

लोगों में पहले थी रुचि, फिर पौधे काटकर किया कब्जा
"धंधापुर में लोगों ने टसर उत्पादन के लिए पौधे लगाते समय रुचि ली, इसके बाद ध्यान नहीं दिए। पौधों को काटकर कब्जा करने लगे, इससे ऐसी स्थिति है। हमनें अच्छा काम किया, अभी 3 महिलाओं को टसर उत्पादन के लिए बीज देकर आया हूं, अब बचे पौधों की देखरेख के लिए भी तैयार नहीं हैं। टसर मार्केटिंग से उत्पादन में दक्ष कर 3 साल बाद समूहों को इसके संचालन की जिम्मेदारी देनी थी।"
-अखिलेश पांडे, सचिव, आदर्श प्रहरी समाज सेवी संस्था



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80% of Arjun's plant in 250 acres has dried up, officers continue to monitor on paper


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