टाटा तीरंदाजी एकेडमी के चीफ कोच धर्मेंद्र तिवारी को द्रोणाचार्य पुरस्कार दिया जाएगा। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद 29 अगस्त को खेल दिवस के मौके पर उन्हें इस सम्मान से विभूषित करेंगे। टाटा तीरंदाजी अकादमी के स्थापना काल 1996 से ही धर्मेंद्र तिवारी कोचिंग दे रहे हैं। उन्होंने तीरंदाज झानो हांसदा, दीपिका कुमारी, डोला बनर्जी,
अतनु दास समेत राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के 200 से भी अधिक धनुर्धरों को तराशा है। धर्मेंद्र मूलतः बिहार के सीवान जिले के रहनेवाले हैं, लेकिन चार दशक से भी ज्यादा वक्त से उनका परिवार जमशेदपुर में रह रहा है। उन्होंने कहा कि तीरंदाजी बोरिंग गेम लगता है, लेकिन एक बार उसकी विशेष जान लें तो यह पैशन बन जाता है। पेश से उनके संघर्ष की कहानी...
मैं योग का अच्छा खिलाड़ी था, बाद में तीरंदाजी का कोच बन गया
स्कूल के दिनों में मैं योग का अच्छा खिलाड़ी था। कई बार राज्यस्तरीय मुकाबलों में मेडल भी जीते। धीरे-धीरे क्रिकेट से जुड़ाव भी होता गया। शाम को योगा और सुबह क्रिकेट खेलने लगा। योग शिक्षक डीके सरकार को मेरा क्रिकेट खेलना नागवार गुजरा। उन्होंने मेरे पिता से तीरंदाजी में हिस्सा लेने की सिफारिश कर दी। मेरे जीवन का यही टर्निंग प्वाइंट बना और मैं तीरंदाजी के करियर की ओर बढ़ चला। 1985 में तीरंदाजी शुरू की। 5-6 साल खुद खेलता रहा और सब जूनियर लेवल पर राष्ट्रीय मुकाबलों में हिस्सा भी लेता रहा। 1994 में तीरंदाजी की ट्रेनिंग देने का फैसला किया।
मैंने सबसे पहले झारखंड पुलिस की खिलाड़ी झानो हांसदा, जियु जारिका को ट्रेनिंग देनी शुरू की। दोनों इंटरनेशनल खिलाड़ी बनीं तो मेरा आत्मविश्वास बढ़ा। 1996 में टाटा तीरंदाजी अकादमी में सहायक कोच बना। आमतौर पर तीरंदाजी बोरिंग गेम लगता है, लेकिन एक बार आप इसकी विशेषता को समझने लगते हैं तो यह आपके लिए पैशन बन जाता है। एकेडमी के खिलाड़ी ओलिंपिक में भी खेलने के लिए पहुंच गए। द्रोणाचार्य सम्मान से यह तय हो गया कि मेरी कोचिंग को राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है।
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