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बेटियों की शादी और घर की कमजोर आर्थिक स्थिति के आधार पर राज्यपाल ने कैदियों की माफ की सजा

प्रदेश की दो जेलों में उम्र कैद की सजा भुगत रहे दो कैदी अब खुले में सांस ले रहे हैं। इनमें से एक रामबिलास साहू ने गांव व परिजनों को सुख चैन की नींद देने सामाजिक बुराई को खत्म किया था जबकि दूसरे भुखऊ 82 साल ने आवेश में आकर जमीन बंटवारे पर कत्ल का इल्जाम था। राज्यपाल अनुसूइया उइके ने पारिवारिक जिम्मेदारी, बेटियों के विवाह, कमजोर आर्थिक स्थिति व उम्रदराजी की संवेदना पर इन दोनों की बाकी सजा माफ कर दी। भुखऊ कैदी नंबर 1104 था। हत्या को मामले में खैरागढ़ कोर्ट ने उम्र कैद की सजा 12 सितंबर 1997 को सुनाई थी। उसे भादवि की धारा 302 व 342 के तहत दोषी पाया गया था। राज्यपाल से गुहार लगाते वक्त वह 15 साल तीन महीने और पांच दिन जेल में पहले ही काट चुका है। आजीवन कारावास की सजा के बाद भी पांच सालों से जेल में था। इस बीच उसके घर में आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गई है। परिवार दाने-दाने को मोहताज था। इसलिए वह और उसके परिजन सजा माफी चाहते थे। दुर्ग जेल अधीक्षक ने भी भुखऊ को छोड़ने की अनुशंसा की। शासन ने उसकी माफी की अर्जी पर कोई अभिमत नहीं दिया था। राज्यपाल ने उसकी सजा क्षमा की और लिखा कि बंदी की आयु, खराब माली हालत एवं भुगती गई सजा को देखते हुए विशेष प्रकरण मानकर सजा माफ की जाती है।
राम बिलास कैदी नंबर 369 था। पत्नी बाल कुंवर साहू ने दया याचिका लगाई थी कि उसने पति रामबिलास के साथ उसके परिवार के पुरुष सदस्य भी जेल में हैं। उसके पति राम बिलास ही परिवार के पालनकर्ता हैं। उसके ससुर यानी रामबिलास के पिता दादूराम भी जेल में हैं। रामबिलास की दो युवा पुत्रियां हैं जिनका विवाह करना जरूरी है। दंडित व्यक्तियों ने ऐसे व्यक्ति को मारा था जिससे पूरा गांव हलाकान था। जगदीश महेश्वर आपराधिक प्रवृत्ति का था। वह बाल कुंवर के साथ ही गांव के सभी लोगों को प्रताड़ित करता था। महिलाओं के साथ दुराचार और उनकी बेइज्जती करता था। बालकुंवर के परिवार के साथ भी मृतक बुरा काम करते रंगेहाथों पकड़ा गया था। उसने रामबिलास की मां के भी हाथ-पैर तोड़ दिए थे। इसकी रिपोर्ट थाने में दर्ज कराई गई थी, किंतु राजनैतिक हस्तक्षेप की वजह से कार्रवाई नहीं हुई। राज्यपाल ने पूरा रिकार्ड खंगालने के बाद पाया कि राम बिलास ने 13 साल 9 महीने 17 दिन की सजा भुगत ली।

"संविधान के अनुच्छेद 161 में दया याचिका पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार राज्यपाल को है। इसी के तहत राज्यपाल ने दया याचिका स्वीकार की।"
- सोनमणि बोरा, सचिव राज्यपाल



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