सफेद ग्रब (कीट) से आलू उत्पादक किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। पिछली बार की तरह इस बार आलू उत्पादक किसानों के लिए खेती लाभकारी साबित नहीं हुई और अधिकांश किसानों को आर्थिक नुकसान पहुंच सकता है। इसके बाद भी अफसर इस ओर गौर नहीं कर रहे हैं।
सामरीपाट पहाड़ी आलू और टाऊ की खेती के लिए मशहूर है। पिछले कई दशक से सामरीपाट सहित आसपास क्षेत्र के लोग पहाड़ी आलू की खेती करते आ रहे हैं। बिना किसी वैज्ञानिक सलाह व सरकारी सहायता के पाट क्षेत्र में बड़े पैमाने पर आलू की खेती की जा रही है। पिछले वर्ष रेट के अभाव में किसानों को आलू की खेती से लाभ नहीं पहुंचा था। वहीं इस बार लाॅकडाउन की वजह से 35-40 रुपए प्रति किलो महंगी दर पर बीज ख़रीदकर बोया। वहीं अब सफेद ग्रब (कीट) रोग लग गया है। जो आलू के बीज को खराब कर दे रहे हैं। किसानों की माने तो खेती में जितना खर्चा आया उतनी राशि भी निकल जाए तो बहुत है। क्योंकि फसल नष्ट होने की कगार पर है।
ऐसे समझें आलू की खेती की लाभ-हानि
पाट क्षेत्र में इस बार किसानों ने 35 से 40 रुपये प्रति किलो बीज खरीदकर आलू लगाया था। सामान्य तौर पर आलू की खेती में बीज के साथ डेढ़ गुना खर्च आता है। इस बार कीट के कारण कीटनाशक में भी अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा। प्रति हेक्टेयर लगभग एक लाख खर्चा आया है। पिछले वर्ष में पांच से छह गुना पैदावार किसानों को मिल रही थी, लेकिन दर 10 से 12 रुपये प्रति किलो की दर से ही मिल रहा था। ऐसे में जितना खर्च प्रति किलो आलू की रोपाई में हुआ। उस अनुपात में आलू बिक्री से राशि नहीं मिल पा रही है।
किसानों को कर्ज अदायगी की चिंता सताने लगी
आलू की खेती के सीजन में बैंकों व साहूकारों द्वारा भी किसानों को ऋण दिया जाता है। किसानों द्वारा केसीसी के माध्यम से विभिन्न बैंकों व साहूकारों से किसानों को लाखों रुपए का कर्ज आलू की खेती के लिए ले रखा है। ऐसे में किसानों के समक्ष कर्ज अदायगी की भी समस्या उत्पन्न हो गई है। किसानों की माने तो जितना खर्चा हुआ उतना पैदावार नहीं होने से उन्हें सीधा नुकसान पहुंच रहा है। ऐसे में प्रशासनिक स्तर पर आलू उत्पादक किसानों को राहत देने की पहल अतिशीघ्र होनी चाहिए।
प्रशासनिक मदद की आस में किसान
इस सीजन में आलू में किसानों को आर्थिक नुकसान निश्चित है। ऐसे में उन्हें प्रशासनिक मदद की आस है। किसानों का मानना है कि यदि अभी प्रशासन द्वारा खेतों में जाकर हालात का जायजा लिया जाए तो वास्तविक स्थिति का पता चल सकेगा। किसान आलू की खेती में बड़ी रकम लगाकर नुकसान की स्थिति में है। यदि सर्वे करा राहत राशि देने की व्यवस्था नहीं की गई तो छोटे किसानों की कमर टूट जाएगी और अगले साल आलू की खेती के रकबे में भारी गिरावट हो सकती है। किसानों को उम्मीद है कि फसल क्षति का जायजा उद्यानिकी व कृषि विभाग के माध्यम से पूरा कराया जाएगा। प्रशासन को आलू उत्पादक किसानों से मुलाकात कर उनके खेतों का अवलोकन करना चाहिए।
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