Skip to main content

अवैध प्लाटिंग के 589 मामले दर्ज, नोटिस के बाद एक पर भी कार्रवाई नहीं हुई

सूर्यकान्त चतुर्वेदी | नगर पालिक निगम अधिनियम 1956, कालोनाइजर का रजिस्ट्रीकरण, निर्बंधन तथा शर्तें नियम 2013, संशोधन 2019,नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम में नियमितीकरण के नाम पर जितने भी संशोधन हुए वह सबके सब अवैध प्लाटिंग, अवैध कालोनियों को रेग्यूलाइज करने के लिए किए गए। जाहिर है कि सारे कानून कहीं न कहीं अवैध प्लाटिंग करने वाले बिल्डर और कालोनाइजरों की मदद करते रहे। नतीजतन अवैध प्लाटिंग का सिलसिला बेरोकटोक जारी है। ‘दैनिक भास्कर’ ने अवैध प्लाटिंग के बारे में पड़ताल की तो पता चला कि संयुक्त संचालक, नगर तथा ग्राम निवेश विभाग में 589 मामले दर्ज किए गए। हैरत की बात यह है कि यह सभी 2016 तक के हैं और इनमें से एक पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। हालांकि सारे प्रकरणों पर विभाग की ओर से नोटिस जारी किए गए पर कोर्ट में परिवाद दायर नहीं हुआ। इधर शासन स्तर पर कई बार अवैध कालोनाजर के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश हुए लेकिन इस पर अमल नहीं हुआ।

जानिए अवैध प्लाटिंग की सूची में बिल्डर गायब, किसान फंसे
अवैध प्लाटिंग यानी कि बिना ले आउट और डायवर्सन के भूमि का उप विभाजन। संयुक्त संचालक नगर तथा ग्राम निवेश विभाग में जितने भी मामले दर्ज हुए वह उस्लापुर, मोपका, अमेरी, कोनी, दोमुंहानी, सकरी, मंगला, सिरगिट्टी, तिफरा के हैं। सूची को देखने से मालूम पड़ता है कि इसमें रसूखदार बिल्डरों की बजाय उनके दलाल और सर्वाधिक किसानों के नाम हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि सारे कालोनाइजर और बिल्डर कायदे से चल रहे हैं। एक बिल्डर ने नाम न छापने की शर्त पर खुलासा किया कि वह लोग किसानों से सीधे सौदा कर टुकड़ों में प्लाट की रजिस्ट्री कराते हैं। इसका फायदा यह रहता है कि एकड़ के भाव में खरीदी गई जमीन की वह कई गुना दर पर वर्गफुट में बिक्री करने में सफल रहते हैं और उनकी संलग्नता भी नजर नहीं आती।

चार साल में एक भी प्रकरण दर्ज नहीं
नगर तथा ग्राम निवेश विभाग में जितने भी मामले दर्ज हुए वह अगस्त 2016 तक के हैं। इसके बाद अवैध प्लाटिंग का कोई भी मामला दर्ज नहीं हुआ। इस बीच संयुक्त संचालक के पद पर 4 अधिकारी क्रमश: एमके गुप्ता, जेसी निदारिया, आरएन प्रसाद, संदीप बांगड़े बदल गए। कानून में भी बार बार परिवर्तन होते रहे।

अवैध प्लाटिंग की जानकारी के बावजूद रजिस्ट्री
अवैध प्लाटिंग के मामले में जैसे ही नगर तथा ग्राम निवेश को जानकारी मिलती है, वह इसकी जानकारी रजिस्ट्री विभाग को भेज देते हैं लेकिन रजिस्ट्री कार्यालय में मिलीभगत के चलते धड़ल्ले से रजिस्ट्री होती है। रजिस्ट्रार कार्यालय के मातहत सूची देखने या मिलान करने की कोशिश नहीं करते। हाल ही में 5 डिसमिल तक के छोटे प्लाट की रजिस्ट्री करने की छूट शासन से देने के बाद कई गुना रजिस्ट्री हुई। इससे शासन को काफी राजस्व प्राप्त हुआ।

छूट पर छूट, एफआईआर से परहेज
अवैध प्लाटिंग के मामले में निगम आयुक्त की ओर से पुलिस थानों को चिट्ठी भेजी गई पर कोई मामला दर्ज नहीं हुआ। इधर कालोनाइजर का रजिस्ट्रीकरण, निर्बंधन तथा शर्तें नियम 2013 में दो मर्तबा 31 दिसंबर 2014 और 31 जुलाई 2019 में संशोधन पर संशोधन हुए। पहला संशोधन 25 प्रतिशत तथा दूसरे में मात्र 10 प्रतिशत आवास के निर्माण पर नियमितीकरण करने का प्रावधान किया गया।

परिवार दायर करने फाइल चलाई थी
"अवैध प्लाटिंग के सारे प्रकरण मेरे चार्ज लेने के पूर्व के हैं। इनके संबंध में नोटिस जारी किए गए थे। परिवाद दायर करने के संबंध में फाइल चलाई गई थी।"
- विनीत, नायर प्रभारी संयुक्त संचालक नगर तथा ग्राम निवेश

एक्सपर्ट व्यू
"धारा 70 के अंतर्गत अवैध प्लाटिंग पर रोक थी। इसके चलते 5 डिसमिल से कम के प्लाट की रजिस्ट्री नहीं होती थी। रोक हटते साथ बड़े पैमाने पर छोटे प्लांट की रजिस्ट्रियां हुईं। डेढ़ साल के अंदर रजिस्ट्री कार्यालयों में छोटे प्लाटों की रजिस्ट्री की समीक्षा की जाए तो अवैध प्लाटिंग का खुलासा हो जाएगा। भू राजस्व संहिता 1959 के अंतर्गत जुर्माने के साथ रजिस्ट्री शून्य करने का प्रावधान है। कालोनाइजर एक्ट का सख्ती से पालन नहीं कराया गया, तो नए बिलासपुर का चेहरू कुरूप हो जाएगा। बेतरतीब बसाहट से आम लोगों की जिंदगी कठिन हो जाएगी।"
-श्याम शुक्ला, आर्किटेक्ट, एसी श्रीवास्तव, रिटायर्ड एसई नगर निगम



Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today


from Dainik Bhaskar https://ift.tt/2XOWAoC
via

Comments