मनीष पांडेय | कोरोना से लड़ने वाले निश्चित रूप से सम्मान के हकदार हैं, लेकिन मानवता के मूल्यों पर नहीं। सम्मान के लिए जहां कर्तव्यों की इतिश्री करने वाला एक ऐसा ही मामला महासमुंद में सामने आया। 13 साल के बच्चे की लाश अस्पताल की सीढिय़ों पर पड़ी रही, उसकी मां डॉक्टरों से गुहार लगाती रही कि पोस्टमार्टम कर दीजिए, ताकि लाश ले जाऊं, लेकिन डॉक्टर्स लाश के सामने पंडाल में कोरोना वारियर्स का सम्मान लेने में लगे रहे। कोमाखान थाना के कछारडीह में रहने वाले 13 साल के बच्चे तेजराम के पेट में दर्द उठा। गांव के झोलाछाप डॉक्टर ने पहले इलाज किया। हालत जब नाजुक हुई, तो 108 बुलाकर जिला अस्पताल ले जाया गया। बच्चे की सुबह 10 बजे मौत हो गई। मौत के बाद लाश सुपुर्द करने के लिए पोस्टमार्टम होना था। बच्चे के पिता हेमलाल और मां इंदिरा बाई डॉक्टरों से गुहार लगाती रहीं। लेकिन इसी लाश के सामने संसदीय सचिव विनोद चंद्राकर को एक एंबुलेंस को हरी झंडी दिखाकर विदा करना था, कोरोना वारियर्स का सम्मान करना था। जब यह सब कार्यक्रम हो गया, तब जाकर पीएम हुआ और मां-बाप को लाश मिली। सिविल सर्जन आरके परदल इस बारे में बोले कि पुलिस की तरफ से पंचनामा नहीं हुआ था, इसलिए दिक्कत हुई, जबकि इनके बयान के उलट कोतवाली प्रभारी शेर सिंह का कहना है कि 12 बजे तक पूरी प्रक्रिया हो चुकी थी। अब या तो पुलिस झूठ बोल रही या फिर सिविल सर्जन। पुलिस और स्वास्थ्य विभाग के आला अफसर अब जांच, कार्रवाई की बात कह रहे हैं, लेकिन मां-बाप घंटों लाश के पास सम्मान समारोह का तमाशा देखते रहे।
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