जिले के दरभा व डिलमिली इलाके में काॅफी और बास्तानार क्षेत्र में हल्दी उत्पादन को जिला प्रशासन द्वारा बढ़ावा दिया जा रहा है। इन उत्पादों का नाम बस्तर काॅफी व बस्तर हल्दी दिया गया है, जो जल्द ही बाजार में उपलब्ध होगी।
प्रशासन का प्रयास है कि जिले के किसानों को धान की खेती के साथ-साथ कॉफी और हल्दी की खेती से भी जोड़ कर उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त किया जा सके। बस्तर का मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए जिला प्रशासन के मार्गदर्शन में जिले के दरभा के पास कोलेंग मार्ग पर वर्ष 2017 में लगभग 20 एकड़ जमीन पर प्रायोगिक तौर पर कॉफी का प्लांटेशन किया गया था। कृषि विश्वविद्यालय के हार्टिकल्चर विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में काॅफी उत्पादन को बढ़ावा दिया गया। इस प्रोजेक्ट को देखने वाले हार्टिकल्चर के प्रोफेसर और अनुसंधान अधिकारी डॉ केपी सिंह ने बताया कि बस्तर में दो प्रजातियों अरेबिका और रूबस्टा काॅफी के पौधे लगाए गए हैं। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने 21 जुलाई को वीडियो काॅन्फ्रेसिंग के माध्यम से दोनों उत्पाद का लॉन्च किया था। न्होंने जिला प्रशासन को निर्देशित करते हुए कहा था कि बस्तर काॅफी और बस्तर हल्दी का बेहतर मार्केटिंग किया जाए।
काॅफी 1 हजार, हल्दी 500 रुपए किलो बिकेगी
सालों बाद बस्तर के वैज्ञानिकों की मेहनत सफल होने के बाद अब इस काफी और हल्दी को खुले बाजार में बेचेंगे। बाजार में जहां काफी को एक हजार रुपए प्रतिकिलो के रेट पर बेचा जाएगा वहीं हल्दी को 400- 500 रुपए प्रति किलो के रेट पर बिकेगी। ज्ञात हो कि थोक में 400 रुपए में बिकने वाली इस हल्दी में कैंसर रोधी गुण पाए जाते हैं जिसके चलते इसे दूसरों देशों में बेचने की योजना बनाई गई है। बस्तर हल्दी के नाम से यह उत्पाद जल्द ही बाजारों में उपलब्ध हो जाएगा।
50-60 साल तक बीज देगा काॅफी का एक पौधा
हार्टिकल्चर काॅलेज के डीन डाॅ. एचसी नंदा ने बताया कि कॉफी का एक पौधा चार से पांच साल में पूरी तरह बढ़ जाता है। एक बार पौधा लग जाने के बाद यह 50 से 60 वर्षों तक बीज देता है। एक एकड़ में लगभग ढाई से तीन क्विंटल कॉफी के बीज का उत्पादन होता है। इसे व्यावसायिक स्वरूप देने के लिए स्थानीय किसानों को भी जोड़ा जा रहा है। किसान कॉफी की खेती से हर साल 50 से 80 हजार प्रति एकड़ आमदनी कमा सकते हैं।
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