आठ दिनों तक मौसी के घर अतिथि बनकर ठहरे भगवान जगन्नाथ बुधवार को भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथारूढ़ होकर श्रीधाम लौट आए। श्रीधाम लौटने पर उन्हें अपने महल का दरवाजा बंद मिला। जगन्नाथ को देवी लक्ष्मी को मनाने और कीमती उपहार देने के बाद ही उन्हें महल में प्रवेश मिल पाया। इस दौरान कपाटफेड़ा की इस रस्म के साथ भक्तों ने बाहुड़ा गोंचा मनाया। 23 से 30 जून तक भगवान अपनी मौसी के घर जनकपुर में रहे। इस दौरान भगवान जगन्नाथ मंदिर, सिरहासार और मावलीमाता मंदिर परिसर में अमनिया के अलावा, हेरापंचमी, छप्पनभोग के कई अनुष्ठान संपन्न हुए।
बुधवार को बाहुड़ा गोंचा के मौके पर सुबह भगवान की आरती करने के बाद उन्हें खिचड़ी अर्पित की गई। शाम चार बजे पाढ़ी और पाणिग्रही ब्राह्मणों द्वारा छेड़ाबाहरा की रस्म पूरी की गई। ब्राह्मणों ने सबसे पहले रथों की पूजा की उसके बाद इनकी परिक्रमा की। इस रस्म के बाद भगवान की पूजा अर्चना की गई।शाम चार बजे के बाद देवताओं की 9 विग्रहों को एक रथ में आरूढ़ कराया गया। इसके अलावा बाकी के विग्रहों को मंदिर के पुजारी और समाज के लोग अपने कंधों पर रखकर लाए। रथों को खींचने विभिन्न समाज के युवक के साथ ग्रामीण भी शामिल हुए। यह रथ सिरहासार से दंतेश्वरी माता मंदिर, मिताली चौक, गोलबाजार होते हुए भगवान जगन्नाथ मंदिर पहुंचा। मौसम साफ रहने से स्थानीय लोगों की भीड़ काफी रही परन्तु ग्रामीण कम नजर आए। बताया गया कि इन दिनों रोपा लगाने का काम चरम पर है इसलिए ग्रामीण व्यस्त हैं।
26 दिनों से चल रहा गोंचा महापर्व का हुआ समापन
शाम करीब सात बजे बड़ी श्रद्घा के साथ विग्रहों को रथों से उतारा गया, लेकिन नाराज माता लक्ष्मी ने उन्हें पहले तो मंदिर में प्रवेश करने ही नहीं दिया। देव को मंदिर प्रवेश कराने के लिए कपाट फेड़ा की रस्म पूरी कराई गई। परंपरानुसार माता लक्ष्मी और भगवान के बीच काफी वार्तालाप हुआ। माता की तरफ से और भगवान की तरफ से 360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज ने लंबे संवाद के बाद भी जब बात नहीं बनी तो भगवान ने देवी लक्ष्मी से कहा कि वे उनके लिए कीमती उपहार लेकर लौटे हैं, तब कहीं श्रीधाम के पट खुले। इस विधान को पूरा करने में करीब एक घंटे से ज्यादा समय लग गया। इसके साथ ही लगभग 26 दिनों से चल रहा बस्तर का गोंचा पर्व संपन्न होता है।
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