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लॉकडाउन में मृत्युभोज बंद करने की परंपरा आगे भी रखें जारी

मृत्यु के बाद सैकड़ों लोगों को भोज कराने से जितना पुण्य मिलता है, उतना ही पुण्य 13 ब्राह्मणों या फिर एक ब्राह्मण के भोज से भी मिलता है। आज की परिस्थिति में अपने स्वास्थ्य और खुद को सुरक्षित रखने की बड़ी चुनौती है। कोरोना काल में लोगों से जितनी दूरी बनाएंगे, उतना ही हम और दूसरे लोग सुरक्षित रहेंगे। इसलिए अब मृत्युभोज का बहिष्कार सभी समाज के हर वर्ग को करना चाहिए। इसकी शुरुआत भास्कर ने की, तो अभियान से लगातार लोग जुड़ने लगे और समाज में इस सामाजिक बुराई के खात्मे के लिए आगे आने लगे। समाज प्रमुखों और धर्मगुरु का तर्क है कि जब लॉकडाउन में लोगों ने मृत्युभोज जैसी कुप्रथा को छोड़कर समाज में एक नई परंपरा को जन्म दिया है, तो अब इस आगे भी जारी रखना चाहिए। क्योंकि एक ओर भीड़ से कोरोना के संक्रमण का खतरा बढ़ रहा है, तो दूसरी ओर कोरोना के कारण समाज की आर्थिक स्थित में भी बदलाव आ रहा है। एैसे में जीवन को सुरक्षित करने के लिए दूरी ही एक मात्रा उपाय है।

1. किसी 1 को भोजन कराना पर्याप्त जरूरी नहीं सबको भोज कराएं
श्री जगन्नाथ मंदिर पोड़ी के महंत सत्यानंद पुरी महाराज ने कहा सैकड़ों की संख्या में होने वाले भोज को नहीं कराना चाहिए, लेकिन परिवार द्वारा पिंड दान, श्राद्ध कराना जरूरी है। वें चाहे तो किसी एक पंडित को भोजन करा सकते हैं। महंत ने रामायण के एक प्रसंग की चर्चा करते हुए बताया कि वनवास के समय भगवान श्रीरामचंद्र ने रेत, फल, पुष्प से अपने पिता दशरथ का श्राद्ध किया था। ऐसे में व्यक्ति अपने पास होने वाले संसाधनों से भी श्राद्ध कर सकता है।

2. मृत्यु के बाद सीमित कार्यक्रम होना चाहिए, गरीबों को मिलेगी राहत
प्रेमाबाग मंदिर के आचार्य पं. देवदत्त त्रिपाठी ने कहा कि न चाहते हुए भी कोरोना संकट से समाज में बदलाव आ रहा है और इसे हमें स्वीकार करना चाहिए। क्योंकि अब पहले जैसी आर्थिक हालत नहीं रही। समाज के प्रमुख और धनवान लोगों से यह आडम्बर शुरू होकर गरीबों पर इस परंपरा की गाज गिरती है। क्योंकि समाज के प्रतिष्ठित लोगों जैसी परंपरा चलाते है, उसे ही बाकी के लोग फॉलो करते हैं। अब आर्थिक, मानसिक समेत शारीरिक सुरक्षा के लिए एक-दूसरे से दूरी बनानी जरूरी है।

3. श्राद्ध कर्म, पिंड दान और तर्पण आदि संस्कार से मृतात्मा को मिलती है शांति
गायत्री शक्तिपीठ बैकुंठपुर के व्यवस्थापक श्रीप्रकाश जायसवाल ने कहा कि गायत्री प्रज्ञा पीठ के अनुसार परंपराओं से बड़ा व्यक्ति का विवेक होता है। व्यक्ति को परंपरा निभाने से पहले अपने विवेक से काम लेना चाहिए। उन्होंने बताया कि शास्त्र में भी मृत्युभोज का जिक्र कहीं नहीं है। इससे संपत्ति का अपव्यय होता है। मृत्यु के बाद श्राद्ध कर्म, पिंड दान और तर्पण आदि संस्कार से मृतात्मा को शांति मिलती है, इतना पर्याप्त है।

4. मृतात्मा को शांति मिले इसके लिए अखंड पाठ सबसे महत्वपूर्ण
गुरुसिंह सभा गुरूद्वारा के ज्ञानी गुरमीत सिंह ने कहा कि सिखों में मृत्यु के बाद गुरूग्रंथ साहेब का अखंड पाठ किया जाता है, क्योंकि मृतात्मा के लिए यह अखंड पाठ ही महत्वपूर्ण है। अखंड पाठ की समाप्ति पर गुरु का सादा और शाकाहारी लंगर कराया जा सकता है। यदि कोई मृत्यु भोज प्रथा को खत्म करना चाहते हैं, तो मैं उसका समर्थन करता हूं। मेरे साथ कई लोग अभियान से जुड़ते जा रहीे हैं।

समाज के डर से गरीब परिवार के लोग मजबूरी में कराते हैं मृत्युभोज, इसे रोकना जरूरी
धर्म गुरुओं का मानना है कि सैकड़ों लोगों को कराया जाने वाला सामूहिक भोज गलत है। कई जगह देखने में आया है कि गरीब परिवार के लोग समाज के कहने पर कर्ज लेकर मृत्युभोज कराने को मजबूर होते हैं। उन्होंने बताया कि धर्मानुसार पिंड दान, शुद्धता, श्राद्ध के साथ पंडितों को भोजन कराना भी पर्याप्त है। जरूरी नहीं कि हम सैकड़ों लोगों को भोज कराए।

वॉट्सएप करें
यदि समाज और संगठन इस कुप्रथा को पूरी तरह बंद करने के लिए सहमत हैं तो पदाधिकारी समाज की सहमति हमें वॉट्सएप पर भेज सकते हैं। हम आपकी सहमति को प्रकाशित करेंगे जिससे अन्य लोगों को भी प्रेरणा मिल सके। जो पदाधिकारी नहीं हैं वे भी अपनी राय दे सकते हैं। मृत्यु भोज में शामिल नहीं होने का निर्णय लेने वाले भी सिर्फ सहमत लिखकर आप हमें 9424253504 पर वॉट्सएप भेज सकते हैं।



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