छत्तीसगढ़ के शिमला के नाम से मशहूर मैनपाट के तिब्बती समाज के सबसे बड़ी मोनेस्ट्री (मंदिर) की पहली बार ड्रोन की तस्वीरें भास्कर अपने पाठकों के लिए लेकर आया है। 15 साल में यह मोनेस्ट्री तैयार हुई है। नेपाल व भूटान के कारिगरों की देखरेख में इसका निर्माण हुआ है। करोड़ों रुपए इसके निर्माण पर खर्च हुए हैं। मैनपाट के टांगीनाथ इलाके में इस विशाल मोनेस्ट्री में तिब्बती कल्चर की छटा देखते ही बनती है। तिब्बतियों के इस विशाल मंदिर को बनने में लामाओं ने मैनपाट के अलावा दूसरे बौद्ध मठाें से इसके लिए राशि जोड़ी है। मैनपाट में साठ के दशक में तिब्बतियों को बसाया गया था। सात कैंपों में यह तिब्बती रहते हैं। तिब्बतियों का मैनपाट में यह सबसे बड़ा मंदिर है। इसके अलावा कैंप नंबर 1, 2, 3 में तीन और मंदिर हैं। तिब्बतियों को यहां बसाए जाने के बाद पर्यटन के नक्शे पर मैनपाट की पहचान बढ़ी। ठंडा इलाका होने के कारण तिब्बतियों को यहां बसाया गया था। तिब्बतियों ने ही यहां टाऊ और खरीफ में आलू की खेती शुरू की थी। इससे प्रभावित होकर स्थानीय लोग भी इससे जुड़ते गए।
बुद्ध की 25 फीट की स्थापित की गई प्रतिमा
यहां गौतम बुद्ध की 25 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित की गई है। मंदिर के संचालक तासी ग्युरमेद ने बताया कि तिब्बती समाज की यंग जेनरेशन को पूर्वजों की परंपरा व विरासत से जोड़ने का ये प्रयास है। यह मोनेस्ट्री साधना स्थल तो है ही, बच्चों के लिए परंपरा और भाषा की शिक्षा दी जा रही है।
गेस्ट हाउस व हाॅस्टल बनने पर होगा उद्दघाटन
पर्यटकों के लिए तिब्बतियों के इस मंदिर को खोल दिया गया है, लेकिन इसका विधिवत उद्दघाटन नहीं हुआ है। गेस्ट हाउस और लामाओं के लिए हाॅस्टल तैयार होने के बाद इसका उद्घाटन होगा।
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