नीरज शर्मा | कभी नक्सली आतंक का पर्याय बन चुका ग्राम महला अब सड़क मार्ग से जुड़ चुका है। एक दशक पहले नक्सली आतंक के चलते यह गांव पूरी तरह से खाली हो गया था। पूरे गांव ने पखांजूर में आकर शरण ली थी तब यह ग्राम चर्चा में आया था। तब इस गांव में पहुंचने सड़क के नाम पर पगडंडी थी जहां आज 9 मीटर चौड़ी पक्की सड़क बन चुकी है। यह संभव हो सका महला में बीएसएफ कैम्प खुलने के बाद। कैम्प खुलने के बाद से यहां नक्सल प्रभाव कमजोर पड़ने लगा तो गांव के लोग भी लौटने लगे। बीएसएफ ने सुरक्षा प्रदान की तो गांव तक 8 किमी सड़क भी बनकर तैयार हो गई।
नक्सलियों से गांव के लोग इस कदर भयभीत थे कि उन्होंने साल 2009 में पूरा का पूरा गांव खाली कर पखांजूर में शरण ले ली थी। वर्ष 2010 में परतापुर से कोयलीबेड़ा 31 किमी सड़क निर्माण कार्य स्वीकृत हुआ जो महला से होकर गुजरती है। नक्सली आतंक के कारण सड़क निर्माण शुुरू ही नहीं हुआ। महला में 2018 में बीएसएफ कैम्प खुला। बीएसएफ के आने के बाद उसकी सुरक्षा में सड़क निर्माण शुरु हुआ। पखांजूर में शरणार्थी के रूप में रहने वाले ग्रामीण लौटने लगे। गांव आबाद होने लगा।
जरूरत पड़ने पर और कैंप लगाएंगे
एसडीओपी पखांजूर मयंक तिवारी ने बताया कि महला तक 8 किलोमीटर सड़क का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है। जवानों ने इसके लिए जी जान लगा सुरक्षा दी। कई नक्सली घटनाएं हई। चार जवान शहीद भी हुए पर कार्य पूरा हो चुका है। बची सड़क का भी निर्माण पूरा किया जाएगा। सुरक्षा के लिए कैम्प बनाने पड़े तो बनाए जाएंगे पर विकास गांव गांव तक पहुंचेगा।
सड़क बनाने के दौरान 4 जवान शहीद हुए
इस सड़क निर्माण का नक्सलियों ने भारी विरोध किया तथा लगातार हमले किए। सड़क की सुरक्षा प्रदान करने रोजाना बीएसएफ जवानों का दल जाता था। नक्सलियों ने 2019 में सड़क को सुरक्षा देने जा रहे बीएसएफ दल पर हमला किया जिसमें चार जवान शहीद हो गए थे। इसके बावजूद बीएसएफ पीछे नहीं हटी जिसका परिणाम है कि आज इस सड़क का काम 75 प्रतिशत पूरा हो चुका है।
पखांजूर से कोयलीबेड़ा की दूरी घटेगी 62 किमी
वर्तमान में पखांजूर के लोगों को ब्लॉक मुख्यालय कोयलीबेड़ा जाने अंतागढ़ होकर 104 किमी का सफर तय करना पड़ता है। इस सड़क के बन जाने से पखांजूर से कोयलीबेड़ा की दूरी मात्र 42 किमी हो जाएगी। यानी कोयलीबेड़ा से पखांजूर की दूरी 62 किमी कम हो जाएगी। इस सड़क के बनने से ना केवल ब्लॉक मुख्यालय जुड़ जाएगा बल्कि नक्सल प्रभावित इलाकों में सीधे प्रशासन और पुलिस की पहुुंच हो जाएगी।
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