कोरलापाल, रोंजे व घोटपाल इन तीन गांवों की सरहद पर नागफनी में बस्तर संभाग का इकलौता पहला नाग मंदिर है। यहां सालों पुरानी नाग- नागिन की प्रतिमा है। साल 1980 के बाद से यहां नागपंचमी के दिन करीब 40 क्षेत्रीय देवी देवताओं को आमंत्रित कर मेला भरता रहा है। लेकिन इस बार कोरोना लॉक डाउन के कारण न तो देवी- देवताओं को आमंत्रण है और न ही मेला भरेगा। ऐसा पहली बार ही होगा। मन्दिर समिति के लोग ही हवन- पूजन करेंगे। मंदिर समिति के सदस्यों ने बताया कि जो भक्त मंदिर पहुंच जाएंगे तो उन्हें मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना जरूरी होगा।
इस गांव व मन्दिर स्थापना का इतिहास भी बेहद रोचक है। ग्रामीण बताते हैं एक समय यहां नाग देवता व अलग- अलग प्रजाति के सांपों का वास हुआ करता था। नाग सबसे ज़्यादा होते थे, वजह यही है इस गांव का नाम ही नागफनी पड़ा। मूर्तियों और इस मंदिर को 4 गांवों के ग्रामीणों ने ही मिलकर संरक्षित कर रखा है। संरक्षण व देखरेख अटामी परिवार के सदस्य ही करते आ रहे हैं। ग्रामीण बताते हैं नाग- नागिन का जोड़ा आज भी मंदिर के पास ही है। कभी- कभी दर्शन देते हैं।इस मंदिर में क्षेत्र ही नहीं बल्कि देश- विदेश के लोग दर्शन करने व मंदिर का इतिहास जानने पहुंचते हैं।
मुगल शासकों ने मंदिरों को तोड़ा था, जमीन से प्रतिमाओं को निकालकर पूजा शुरू की, चंदा कर मंदिर बनाया
इस मंदिर का इतिहास नागवंशी शासन काल से जुड़ा हुआ है। मंदिर के पुजारी प्रमोद अटामी बताते हैं 10वीं से 13वीं शताब्दी के बीच की मूर्तियां हैं। क्षेत्र में कई सारे मन्दिर थे। मुगल शासकों के काल में मंदिरों को तोड़ा गया, मूर्तियों को ज़मीन के अंदर गाड़ा गया था। उस वक़्त कई सारी मूर्तियां खंडित हुई थी। नाग देवता की प्रतिमा ज़मीन के अंदर दबी हुई थी। जिसे पूर्वजों ने निकालकर पूजा अर्चना शुरू की। इन मूर्तियों को दंतेश्वरी मन्दिर में ले जाने की कोशिश भी हुई थी। लेकिन ऐसा नहीं हो सका, क्योंकि नाग देवता यहीं रहना चाहते थे। पिताजी लखमे अटामी को स्वप्न में नाग देवता के दर्शन हुए और बताया कि एक और मूर्ति आधा किलोमीटर दूर दबी पड़ी है। फिर उसे भी जाकर निकाला गया और नाग- नागिन जोड़े की प्रतिमा को एक जगह लाकर रखा गया। 4 गांवों के ग्रामीणों को इस नागदेवता मंदिर की देखरेख की जिम्मेदारी दी गई है, जिसे बखूबी निभा रहे हैं।
मंदिर को भव्य बनाने प्रशासन का नहीं मिला सहयोग
नाग देवता का यह मंदिर गीदम- बारसूर मुख्य मार्ग के किनारे ही स्थित है। ग्रामीणों ने इस मन्दिर को बनाकर मूर्तियों को संजोकर ज़रूर रखा है। लेकिन बड़ी बात ये है कि आज तक इस मंदिर के लिए किसी तरह का सहयोग न तो प्रशासन और न ही पुरातत्व विभाग से मिला है। ग्रामीणों ने कहा कि गार्डन, शौचालय, पानी,पार्किंग, बाउंड्रीवॉल जैसी बेसिक सुविधा के साथ मंदिर को भव्य बनाया जा सकता है। पर्यटन नगरी बारसूर जाने वाले लोग यहां रुककर पूजा अर्चना करते हैं। लोगों की आस्था व कई सारी मान्यताएं भी जुड़ी हुई हैं।
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