रांची जिले में शिशुओं को फेंके जाने की घटना में कमी आई है। जनवरी से अब तक सात मामले शिशुओं को फेंकने के आए हैं। जबकि पहले औसतन हर माह जिले में तीन से चार मामले ऐसे आते थे। दूसरी ओर बच्चा सरेंडर करने के मामले बढ़े हैं। 6 माह में 15 मां ने अपने बच्चे को फेंकने की बजाय सीडब्ल्यूसी के पास सरेंडर करना बेहतर समझा। पहले औसतन एक-दो मामले ही सरेंडर के हर महीने आते थे।
सीडब्ल्यूसी अध्यक्ष रूपा वर्मा का कहना है कि फेंकने की बजाय सरेंडर करने के आंकड़े बढ़ना सुखद है। अगर कोई मां किसी कारणवश बच्चे को पालने में सक्षम नहीं है, तो वह उसे सरेंडर कर नया जीवन दे सकती हैं। वैसे अब जागरूकता बढ़ी है। कई अविवाहित मांओंने भी अपने बच्चे को सरेंडर किया है।
बच्चे को लीगली फ्री करने की प्रक्रिया नहीं हो पा रही
बच्चे को सरेंडर करने के बाद 60 दिन तक उसकी मां का सीडब्ल्यूसी इंतजार करती है। अगर इस दौरान वह अपने बच्चे को फिर से लेना चाहे, तो ले सकती है। इसके बाद सीडब्ल्यूसी उसे लीगली फ्री करती है। जिसके बाद कारा गाइडलाइन के तहत कोई गोद ले सकता है। लेकिन वर्तमान में सीडब्ल्यूसी बेंच का कोरम अधूरा है, अध्यक्ष और एक सदस्य हैं। जबकि तीन सदस्यों से ही कोरम पूरा हो पाएगा।
पोक्सो मामले में पीड़िता को इंसाफ मिलने में होगी देर
लॉकडाउन के दौरान नाबालिगों के साथ दुष्कर्म के मामले बढ़े हैं। सीडब्ल्यूसी के पास जनवरी से अब तक 53 मामले आए हैं। इनमें से 23 मामले लॉकडाउन के दौरान के हैं। अधिकतर मामलों में नाबालिगों के साथ उनके रिश्तेदार या पड़ोसियों ने ही ज्यादती की है। नियमानुसार पीड़िता से बयान लेकर इस कॉपी पर सीडब्ल्यूसी के 3 सदस्यों का हस्ताक्षर होता है, जिसे कोर्ट में प्रस्तुत किया जाता है।
लेकिन अब कोरम अधूरा रहने के कारण पीड़िता को न्याय मिलने में भी देरी होगी। सीडब्ल्यूसी बयान तो ले लेगी, लेकिन कोरम पूरा नहीं होने के कारण इस बयान की कॉपी कोर्ट में मान्य नहीं हो पाएगी। इधर, नियुक्ति प्रक्रिया के संबंध में पूछे जाने पर राज्य बाल संरक्षण संस्था के डायरेक्टर डीके सक्सेना ने कहा कि लॉकडाउन की वजह से विज्ञापन नहीं निकल पाया था। वैसे वर्तमान स्थिति में क्या किया जा सकता है, इस पर भी जल्द निर्णय लिए जाने की उम्मीद है।
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