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बस्तर में पहली बार होगा जिंक राइस का उत्पादन

बस्तर में पहली बार जिंक की कमी दूर करने वाले धान का उत्पादन होगा। जिले के कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने इस खेती को लेकर सात ब्लॉकों के 50 किसानों का चयन कर लिया है जो इस धान की खेती करेंगे।
इंदिरा गांधी कृषि विवि के वैज्ञानिकों ने धान की एक नई किस्म विकसित की है। जिंको राइस और सीजेडआर-2 की पैदावार पहली बार बस्तर जिले में की जाएगी। इसके लिए कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों ने शुरू कर दी है। किसानों को यह बीज केवीके के द्वारा मुफ्त में दिया जाएगा। किसानों को इस धान की खेती करने के बाद कोई नुकसान न हो इसलिए किसानों का धान बीज विकास निगम में बिकवाया जाएगा।
कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि यह बीज भिलाई से लाकर यहां लगाया जाएगा। पोषण की कमी से जूझ रहे जिले के लिए चावल की यह किस्म फायदेमंद साबित होगी। कृषि विज्ञान केंद्र के प्रमुख एसके नाग ने बताया कि इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इस जिंक राइस की खोज की है, जिसमें जिंक की मात्रा सामान्य से 8 पीपीएम अधिक है। इस चावल को खाने से शरीर में जिंक की कमी दूर होती है वहीं यह कुपोषण से लड़ने में भी कारगर है।
रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में है उपयोगी
हमारे खान-पान में पोषक तत्वों की काफी कमी है। अन्य किस्म के चावल में भी जिंक की मात्रा कम है जिसके कारण बच्चे के उम्र के अनुसार दिमाग का विकास न होना, हड्डियों पर असर पड़ना सहित कई प्रकार की बीमारियां होती हैं। ऐसे में जिंक राइस का सबसे ज्यादा फायदा बच्चों और गर्भवती महिलाओं को होगा। इसमें जिंक की मात्रा प्रति सौ ग्राम में 22 से 24 पीपीएम है। वहीं सामान्य चावल में 12से 14 पीपीएम होता है। आयरन की कमी होने पर शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी आ जाती है, लेकिन जिंक की कमी पूरे शरीर पर प्रभाव डालती है। इस बारे में डॉ. नवीन दुल्हानी ने कहा कि जब हम आयरन युक्त खाना खाते हैं तो आपके हीमोग्लोबिन की मात्रा ठीक हो जाती है, लेकिन जिंक पूरे मेटाबॉलिज्म के लिए जरूरी होता है।

100-110 दिनों में तैयार होती है फसल
शस्य वैज्ञानिक स्वाति ठाकुर ने बताया जिंको राइस और सीजेआर -2 की यह प्रजाति केवल 100- 110 दिनों में ही पक कर तैयार हो जाती है। इसकी उत्पादकता 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इसकी ऊंचाई 95-100 सेमी होती है इसकी पैदावार उच्चहन भूमि में की जाएगी । इस बीज को तैयार करने में वैज्ञानिकों को 8 साल लग गए थे। इसमें सफलता मिलने के बाद ही इस धान की खेती का फायदा हर किसान को देने विश्वविद्यालय ने योजना तैयार की है जिसके चलते इसकी खेती बस्तर जिले में की जा रही है।



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