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न्यूजीलैंड में लोगों ने खुद नियम माने... इसलिए मास्क से भी मिली मुक्ति

(अमिताभ अरुण दुबे)न्यूजीलैंड में अब सोशल डिस्टेंसिंग खत्म हो गई। कोई मास्क भी नहीं लगा रहा है। सब कुछ वैसा ही हो गया जैसा चार माह पहले था। लोग कहीं भी जा रहे हैं, पार्टी कर रहे हैं और मिल जुल रहे हैं। फरवरी में बेटे के पास इनवरकार्गिल गई तो धीरे-धीरे कोरोना की खबरें आने लगीं। फिर अचानक 25 मार्च को न्यूजीलैंड में भी लाॅकडाउन का पहला चरण लागू कर दिया गया। इसके बाद तुरंत बाद वहां की सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर सन्नाटा छा गया। न्यूजीलैंड में चार लाॅकडाउन हुए और हर नागरिक ने खुद सारे नियमों का पालन किया। इस तरह लड़ाई जीती।
इनवरकार्गिल में अब तक रह रहीं मनीषा की जुबानी - मैंने देखा कि लॉकडाउन के पहले चरण में सड़कों पर भारत की तरह पुलिस नहीं तैनात थी, न ही फ्लैग मार्च निकाले जा रहे थे। पीएम ने पूरे देश को एक टीम कहा। सभी लोग नियमों से अच्छी तरह वाकिफ थे। आवश्यक सेवाओं से जुड़ी दुकानें शहर में खुली थीं। एक घर से एक ही व्यक्ति जरूरी सामान लेने निकलता था, बाकी खिड़कियों में भी नजर नहीं आते थे। इस चरण में न्यूजीलैंड ने तेजी से फ्री टेस्टिंग और इलाज पर फोकस किया।

उसमें भी बुजुर्ग और दिव्यांगों पर ज्यादा ध्यान दिया गया। ऐसे बुजुर्ग और दिव्यांग जिनके घरों में कोई मार्केट जाने वाला नहीं था, उन तक जरूरी सेवाएं पहुंचाई गई। दिव्यांग और बुजुर्गों के लिए आवश्यक सेवाओं की दुकानों में खास बंदोबस्त किए गए थे। हर जगह क्यूआर स्कैनिंग (आरोग्य सेतू एप जैसा सिस्टम) की सुविधा दी गई। पहले चरण के एक माह बाद 27 अप्रैल से लाॅकडाउन का दूसरा चरण शुरू हुआ। इसमें कामकाज की रियायतें दी गईं। लोग अपने घरों से आफिस जाना-आना कर सकते थे, बिजनेस भी खुला। लेकिन इस दौरान कांटेक्ट ट्रेसिंग और टेस्टिंग बढ़ा दी गई। एक खास बात ये भी देखी कि जो लोग विदेश अाकर न्यूजीलैंड में लाॅकडाउन में फंस गए थे, वे भी सख्ती से क्वारेंटाइन नियमों का पालन कर रहे थे।

लाॅक-3 से ही अनुशासित पार्टियां, रेस्टोरेंट मेंं भी सोशल डिस्टेंसिंग
मनीषा के मुताबिक - लॉकडाउन के तीसरे लेवल में जो 13 मई को शुरु हुआ, उसमें कई सारे रियायतें शहर को मिलने लगी। इसमें दुकान रेस्टारेंट बीच पर जाना सबकुछ अलाउ किया गया, लोग पार्टी भी कर सकते थे, लेकिन इसमें दस से ज्यादा लोग नहीं होने चाहिए थे।

दुकानों रेस्टारेंट और पब्लिक प्लेस में आवाजाही के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क सेनिटाइजर जैसे नियम लागू रहे। ऑफिस और दुकानों को खोलने की अनुमति दी गई सीमित संख्या में स्टॉफ के साथ। लोग बाहर यानी दूसरे शहरों में भी आ जा सकते थे। दुकानदार दुकान में आने वाले हर एक व्यक्ति का रिकॉर्ड रख रहे थे। वो कहां रहता है, उसका मोबाइल नंबर क्या है। दुकान या रेस्टारेंट में कब दाखिल हुआ वहां से कब निकला। वो परिसर के अंदर कितनी देर रहा, सब पर बारीकी से नजर रखी जाती रही।

आत्मनियंत्रण है मूल मंत्र : न्यूजीलैंड में चौथे चरण का लाॅकडाउन 8 जून को लगा और उसी दिन देश ने खुद को कोरोनामुक्त भी घोषित कर लिया। तब से वहां हर आदमी की जिंदगी सामान्य हो गई है। अनुशासन और एहतियात के साथ-साथ इस लड़ाई में जीत के कुछ और औजार भी हैं। -जैसे फ्री टेस्टिंग और ट्रीटमेंट का पारदर्शी सिस्टम।

इसी देश ने दुनिया का बेस्ट रिकवरी रेट (96 प्रतिशत) भी अजीव किया। आत्मनियंत्रण न्यूजीलैंड की जीत का सबसे बड़ा मंत्र है। ये इस बात से भी समझा जा सकता है कि यहां किसी भी तरह पुलिस को नियमों का पालन करवाने के लिए सामने आने की दरकार नहीं पड़ी।



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In New Zealand, the people themselves obeyed the rules… hence the freedom from masks too


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