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अपने ही गांव और शहर में दे रहीं सेवा क्योंकि दूर करनी थी डॉक्टर की कमी

एक समय दंतेवाड़ा के बच्चों के लिए डॉक्टर-इंजीनियर बन जाना महज़ सपना हुआ करता था, लेकिन अब ये हकीकत का रूप ले रहा है। दंतेवाड़ा की ऐसी दो बेटियां हैं, जो औरों के लिए बड़ी प्रेरणा बनी हुईं हैं। इस डॉक्टर-डे पर हम उन्हीं दो बेटियों के बारे में हम आपको बता रहे हैं, जिन्होंने अपने गांव-शहर के लोगों को डॉक्टर की कमी से जूझते देखा और खुद लक्ष्य बना तय कर लिया कि उन्हें इस कमी को पूरा करना है। अभावों व चुनौतियों के बीच भी पीछे नहीं हटीं। डॉक्टर बनीं और सेवा देने अपने ही इलाके को चुना। आज क्षेत्र के लोग इन डॉक्टर बेटियों पर नाज कर रहे हैं।
नक्सलगढ़ गांव के हॉस्टल में रहकर पढ़ाई की, कुआकोंडा अस्पताल में कर रहीं इलाज
धुर नक्सलगढ़ माडेंदा गांव की लक्ष्मी नाग डॉक्टर बनकर रोगों का इलाज कर रही हैं। लक्ष्मी ने अभावों में पढ़ाई पूरी की। लक्ष्मी के पिता पोस्टमास्टर हैं। लक्ष्मी ने समेली, जगरगुंडा जैसे नक्सलगढ़ गांवों के हॉस्टल में रहकर पढ़ाई की है। इसके बाद कुआकोंडा में 12वी तक की पढ़ाई के बाद दुर्ग चली गईं। जहां सरकारी खर्च से मेडिकल की पढ़ाई की। लक्ष्मी जिस ब्लॉक की रहने वाली हैं, उसी ब्लॉक कुआकोंडा के अस्पताल में सेवा दे रही हैं। डॉ लक्ष्मी औरों के लिए बड़ी प्रेरणा हैं।
पिता और भाई की मौत के बाद बड़ी बहन ने पढ़ाई पूरी कराई
गीदम की पहली डॉक्टर बेटी सविता टांगराज भी किसी बड़ी प्रेरणा से कम नहीं है। सविता ने शहर के अस्पताल को डॉक्टर की कमीं से जूझते देखा और प्रण लिया कि उन्हें डॉक्टर बनना है। पिता और भाई ने भी बेटी को डॉक्टर बनाने का सपना देखा था। कोल्हापुर में मेडिकल की पढ़ाई के दौरान पहले पिता फिर बड़े भाई को खोया। तब भी हिम्मत नहीं हारीं। बड़ी बहन ने जैसे तैसे पढ़ाई पूरी कराई है। सविता डॉक्टर बन गईं। बड़े शहरों के अस्पताल की नौकरी को छोड़ अपने शहर को चुना। पहले दो साल जिला अस्पताल और फिर करीब सालभर से गीदम के अस्पताल में सेवा दे रही हैं। फिलहाल कोविड अस्पताल में इनकी ड्यूटी लगी है।



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Service rendered in our own village and city because the doctor had to be removed


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