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पहले अपनों की हत्या का दर्द, अब बरसों से नौकरी के लिए भटक रहे आश्रित

नक्सल हिंसा में अपनों को खोने वाले ग्रामीणों को सरकारी नौकरी देने का नियम है, लेकिन अब भी कई ऐसे लोग हैं, जो पहले नक्सलियों के दिए दर्द का शिकार हुए और अब नौकरी नहीं मिलने का दर्द झेलकर सिर्फ दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।
भास्कर ने पड़ताल में पाया कि नवम्बर 2018 तक के 9 मामले राज्यस्तर पर पेंडिंग पड़े हैं। जबकि दिसम्बर 2018 में नई सरकार बनने के बाद से एेसे मामलों को शासन स्तर पर भेजा ही नहीं गया। जबकि इन डेढ़ सालों में 5 से ज्यादा लोगों की नक्सलियों ने बेरहमी से हत्या कर दी। दंतेवाड़ा में एक केस तो 2006 का है। 7 महीने से पुनर्वास समिति की बैठक भी नहीं हुई है। बताया जा रहा है पहले ऐसे मामलों पर नौकरी देने का अधिकार कलेक्टर को होता था। लेकिन 2018 से नियम में बदलाव कर शासन ने अपने हाथ में ले लिया है। वित्त विभाग से स्वीकृति के लिए अटके मामलों में से नक्सलियों द्वारा आगजनी की गई बस में जलने वाले युवक सतीश हो या गोलीबारी में मारे गए दूरदर्शन के कैमरामैन अच्युतानंद साहू। कलेक्टर दीपक सोनी ने बताया कि अभी कितने मामले पेंडिंग हैं और क्यों हैं, पता करता हूं। टीएल मीटिंग के बाद इस संबंध में बैठक भी होगी।

केस:1
साल 2018 को नक्सलियों ने इंद्रावती नदी पार पाहुरनार गांव के सरपंच पोसेराम की हत्या कर दी थी। नक्सलियों ने बेटे को गांव से भी भगा दिया है। ऐसे में नौकरी के लिए चक्कर काट ही रहा है।
केस:2
2019 में गुडरा में मारे गए उपसरपंच के परिजन को भी अभी नौकरी नहीं मिली है। ऐसे कई प्रकरण हैं।

केस:3
मार्च 2020 को नक्सलियों ने नीलावाया में गोपनीय सैनिक के भाई की हत्या कर दी थी।

केस:4
करीब दो महीने पहले चिकपाल में नक्सलियों ने गोपनीय सैनिक के पिता की हत्या की थी।
ये है प्रावधान
नक्सल हिंसा में मारे गए लोगों के परिजन को सरकारी नौकरी और 5 लाख रुपए देने का प्रावधान है। इसके लिए पुलिस मामले की जांच करती है, फिर पुनर्वास समिति में आवेदनों पर निर्णय लेकर राज्यस्तर पर भेजे जाते हैं।



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पाहुरनार के सरपंच पोसेराम के परिजन


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