दक्षिण बस्तर का दंतेवाड़ा ही नहीं बल्कि पूरे बस्तर में इस बार टीसीओसी ( टैक्टिकल काउंटर ऑफेंसिव कैम्पेन) में पहली बार ऐसा हुआ कि नक्सलियों ने हमले में बारूद की बजाए गोलियों का ज्यादा इस्तेमाल किया। जबकि इसके पहले नक्सली ब्लास्ट से जवानों को क्षति पहुंचाते थे, गोलियों का इस्तेमाल कम से कम करते थे। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि पिछले कुछ सालों से कारतूस की कमी झेल रहे नक्सलियों के पास साल 2020 के टीसीओसी में आखिर इतनी गोलियां आई कहां से? इस सवाल ने पुलिस अफसरों की चिंता बढ़ा दी है। अब जब सुकमा में जवानों के ही तार नक्सलियों से जुड़े और दो जवानों द्वारा ही कारतूस सप्लाई करने का खुलासा हुआ तो अफसरों के होश उड़ गए। अब बस्तर से लेकर रायपुर तक हड़कंप मचा हुआ है। सूत्र बताते हैं खुद सीएम भूपेश बघेल एकाएक नक्सलियों के पास कारतूस की भरमार और जवान के नक्सल कनेक्शन के मामले में नाराज चल रहे हैं। अब बात ये है कि नक्सल इलाके में इस कारतूस खजाने को सुरक्षित रखने आखिर खुद ही सिस्टम कहां चूक रहा है। भास्कर ने इसकी पड़ताल की तो कई सारे चौंकाने वाले खुलासे हुए। बड़ी बात ये पता चली कि नक्सल इलाके में गोलियों और हथियारों के खजाने यानी शस्त्रागार की सुरक्षा में ही बेहद ढील है।
शस्त्रागार का जिम्मा डीएसपी की जगह एएसआई लेवल अधिकारी के पास
- नक्सल प्रभावित जिलों में आर्मरी (शस्त्रागार) का जिम्मा एएसआई लेवल के अधिकारी के पास है। जबकि इस खजाने की चाबी डीएसपी लेवल के बड़े अफसर के पास होनी चाहिए।
- आर्मरी में सीसीटीवी कैमरे तक नहीं होते, जिससे संदिग्धों पर नजर रखी जा सके।
- यहां स्पेशल गार्ड की व्यवस्था ही नहीं है ताकि अगर कोई आर्मरी से बाहर निकलें तो चेक किया जा सके।
- ऑपरेशन के बाद लौटने वाले जवानों की गोलियों की गिनती में कई बार देर।
- सरेंडर नक्सलियों से पूछताछ करने पर कारतूस सप्लाई का खुल सकता है राज।
इस टीसीओसी दक्षिण बस्तर के 3 जिलों में हुई मुठभेड़
- मार्च महीने में सुकमा में जवानों के साथ अंधाधुंध फायरिंग की थी। जिसमें 17 जवानों की शहादत हुई थी।
- बीजापुर में भी इस टीसीओसी जवानों ने बारूद नहीं, बल्कि जवानों पर गोलियां बरसाकर नुकसान पहुंचाने की कोशिश की। एक जवान शहीद व एक ग्रामीण क्रॉस फायरिंग में घायल भी हुआ।
- दंतेवाड़ा में इस साल जितनी भी मुठभेड़ें हुईं, इसमें जवानों व नक्सलियों का सीधा आमना-सामना हुआ और गोलियां चलीं। एसपी डॉ अभिषेक पल्लव ने कहा कि नक्सलियों के पास भी कारतूसों की इस बार कमीं नहीं रही। नक्सलियों की तरफ से गोलियां ज्यादा चलीं। हमने भी मुंहतोड़ जवाब दिया और इनामी नक्सलियों को मार गिराया है।
जवान के पकड़े जाने के बाद किए गए थे ये बदलाव
अक्टूबर 2018 कासोली सीएएफ कैंप के एक जवान नक्सलियों को हथियार सप्लाई के मामले में पकड़ा गया था, बाद में उसने स्वीकारा कि 1000 राउंड नक्सलियों को बेच चुका है। पकड़े जाने के बाद दंतेवाड़ा में ये बदलाव करने पड़े थे-
- शस्त्रागार का जिम्मा वैसे तो एएसआई लेवल के अधिकारी के हाथ में है, लेकिन मॉनिटरिंग के लिए दंतेवाड़ा में डीएसपी की जिम्मेदारी तय की गई।
- मुठभेड़ से लौटते ही जवान पास के कैंप में रुककर राउंड की गिनती सेक्शन कमांडर, हेड कांस्टेबल से कराते हैं। पुलिस लाइन में आने के बाद दोबारा गिनती होती है।
- दूसरे जिले में जाने वालों पर नजर।
- संदिग्ध, गोपनीय सैनिक के सरप्राइज मोबाइल लोकेशन व मूवमेंट ट्रैकिंग।
इस टीसीओसी नक्सलियों ने इस बदली रणनीति के तहत काम :
- पुरानी नीति गोरिल्ला के साथ नई मोबाइल नीति युद्ध।
- गोलियों का ज्यादा इस्तेमाल।
- नक्सल कैंपों तक पुलिस के पहुंचने पर टुकड़ियां बनाकर अलग-अलग दिशा में भागना ताकि पुलिस पीछा न कर सके।
सीधी बात
पी सुंदरराज, आईजी बस्तर
सवाल - टीसीओसी में नक्सलियों ने भी बदली रणनीति के तहत काम किया?
- हम भी रणनीति बदल कर काम कर रहे हैं। इस बार टीसीओसी में मिनपा हमले को छोड़ दें तो नक्सली सफल नहीं हो पाए।
सवाल - नक्सलियों को कारतूस बेचने के मामले में पहले दंतेवाड़ा और अब सुकमा से जवान को पकड़ा गया, ऐसे मामलों पर कैसे कंट्रोल करेंगे?
- पुलिस के नेटवर्क से ही ऐसे लोग घेराबंदी कर पकड़े गए हैं। जिनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई भी हुई है।
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