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कागजों में सिमटी शिल्पसिटी, एक साल में बननी थी, 8 साल में सिर्फ बाउंड्री ही बनी

अपनी शिल्पकला का लोहा मनवाने वाले भेलवापदर के कलाकारों को एक नई पहचान दिलाने के लिए शासन-प्रशासन ने 2012 मेंं 3 करोड़ 14 लाख की लागत से शिल्पसिटी बनाने की शुरुआत की थी। तत्कालीन कलेक्टर नीलकंठ टीकाम ने भी इसके लिए 40 लाख रुपए जारी किए थे। लेकिन अन्य सरकारी योजनाओं की तरह इसका भी वहीं हाल हुआ। एक साल में बनने वाले शिल्पसिटी की आठ साल बाद सिर्फ बाउंड्री ही बनी है। शहर में 5 एकड़ में बन रही यह शिल्पसिटी आज भी पूरी नही हो पाई है और न ही कोई इसकी सुध लेने वाला है। इस शिल्पसिटी में इन शिल्पकारों के लिए शिल्प भवन, आवास और शो रूम तक का निर्माण हो रहा है जहां से लोग इनका सामान ले सकें लेकिन अब ये भी खंडहर बनते जा रहे हैं। इनका सामान तौल पर न बिके इसलिए भी योजना बनी लेकिन सरकारी कागजों पर ही धूल खा रही है।
वहीं दूसरी तरफ कोरोना संक्रमण के चलते देश दुनिया में अपनी शिल्पकला का लोहा मनवाने वाले भेलवापदर के कलाकारों के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है। अपने परिवार की भूख मिटाने दिहाड़ी मजदूरी को मजबूर हैं। शिल्पकारों की मांग थी कि कच्चा माल महंगा मिलता है तो पूर्व क्लेक्टर नीलकंठ टीकाम ने एक अच्छी पहल करते शहर में ही शिल्प बैंक का निर्माण कर 40 लाख रुपए जारी कर दिए। इसका मकसद जरूरतमंद शिल्पियों को बिना ब्याज के राशि उपलब्ध करवाना था। लेकिन यह रकम किसी जरूरतमंद शिल्पी को नहीं मिल पा रहा है। शिल्पकारों ने कहा कि जो शिल्प बैंक बना है उसमें हमें सामान मार्केट से महंगा मिल रहा है इसके अलावा उन्हें कोई लोन भी नहीं मिला है सिर्फ चुनिंदा लोगों को ही इसका लाभ मिल रहा है।
कभी विदेश तक बेचते थे में शिल्पकला, आज बेरोजगार : कभी ये शिल्पकार अपने शिल्प को देश विदेश में बेचकर अपना भरण पोषण करते थे। आज सभी बेरोजगार होकर रह गए हैं। अब इनको रोजी रोटी के लिए अपने कार्य से हटकर भवन निर्माण एवं अन्य काम करना पड़ रहा है। ऐसे में शासन प्रशासन से अनुरोध है कि इनको सही रास्ता दिखाए।
आजतक सिर्फ 25 फीसदी ही हुआ काम
शिल्पसिटी में अब तक 25 फीसदी काम भी ढंग से नहीं हो सका है। हालांकि बाउंड्री वाल बन गई है लेकिन इसके भीतर जो काम होना था वह अभी भी लंबित है। लोक निर्माण विभाग के ईई एचएस सलाम ने बताया कि शिल्पसिटी में विभिन्न कार्यों के लिए निविदा के बाद साल 2015 में संबंधित ठेकेदार से अनुबंध किया गया था। यह काम एक साल में पूरा किया जाना था। इसके तहत शोरूम कर्मशाला आवास आदि बनाए जाने थे। काम क्यों नहीं हुआ या ठेकेदार पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई इस संबंध में वे कोई भी जवाब देने को तैयार नहीं है।
ये कहना है शिल्पियों का
शिल्पी जगनाथ नाग, पंकज नेताम, विकास बघेल, अंकित नेताम, निर्मल नेताम, बीरबल नेताम, आकाश सागर, रेखा नाग, शकुंतला नाग, प्रेमबती सागर, जमनी बेसरा, कमला सोनवानी का कहना है कि हम 1 साल पहले तक पूरे देश के बड़े शहरों में अपना शिल्प का सामान बेचते थे। वहीं आज हालात बदतर हो गए हैं। शिल्प बैंक में हमें बाजार भाव से भी महंगा सामन मिल रहा है। शिल्पियों के लिए 40 लाख रुपए मिले हैं लेकिन किसी को एक रुपये का भी लोन नहीं मिल रहा है। ऐसे में शिल्पियों को 40 लाख रुपए से क्या फायदा मिला इस ओर प्रशासन को ध्यान देना चाहिए जिससे उन्हें राहत मिल सके। शिल्पियों को कोंडागांव के बेहतरीन मूर्ति कलाकार की सुध लेने वाला आज कोई नहीं है।

शिल्पसिटी का काम जल्द पूरा करेंगे
क्लेक्टर पुष्पेंद्र मीणा ने कहा जिले की पहचान ही शिल्पियों के नाम से होती है, जो लंबे समय से बंद है। शिल्पसिटी का काम जल्द से जल्द पूर्ण कर लेंगे और देखेंगे कि जो 40 लाख रुपए इनके उत्थान के लिए दिए गए हैं उसका उपयोग कहां कहां हुआ है। आने वाले समय में प्रयास होगा कि उनके लिए योजना बने।



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The limited craftsmanship in the paper was to be made in one year, only the boundary was made in 8 years


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