मोहम्मद इमरान नेवी |कोरोनाकॉल में सरकारी खजाने में आवक कम हो गई थी। लॉकडाउन के दौरान सरकारों की आर्थिक स्थिति भी कमजोर हो गई है। लेकिन इस संकट के दौर में भी सरकारी पैसों का दुरुपयोग किया जा रहा है। ये नया मामला मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल जगदलपुर (मेकॉज) का है। यहां महारानी हॉस्पिटल से एक नियमित रेडियोलॉजिस्ट डॉक्टर को अटैच करने के बाद चार गुना ज्यादा पैसे दिए जा रहे हैं जिसका भुगतान डीएमएफ फंड से किया जा रहा है।
दरअसल, 5 महीने पहले इस सेकेंड क्लास ऑफिसर रैंक के स्थायी सरकारी डाॅक्टर (रेडियोलॉजिस्ट) को राज्य सरकार ने 60 हजार रुपए की सैलरी पर महारानी हॉस्पिटल में पोस्टिंग दी थी। हफ्तेभर बाद मेकॉज में रेडियोलॉजिस्ट की जरूरत पड़ी तो इस डाॅक्टर को अटैच कर दिया गया लेकिन इंन्सेंटिव के नाम पर 4 गुना ज्यादा भुगतान भी शुरू कर दिया ।
ऐसे समझें, सरकारी पैसों की बर्बादी का खेल
महारानी हॉस्पिटल के रेडियोलॉजिस्ट को सरकार ने 60 हजार रुपए के वेतन पर स्थायी नौकरी दी थी, इसके बाद उन्हें तत्कालीन कलेक्टर अय्याज तंबोली ने मेकॉज में अटैच कर दिया। यहां अटैच होने के बाद भी उन्हें 60 हजार के वेतन पर ही काम करना था और यही छत्तीसगढ़ सरकार के वित्त विभाग का नियम भी कहता है, लेकिन मेकॉज में आते ही उन्हें एक लाख रुपए हर माह अतिरिक्त भुगतान करने की शुरुआत कर दी गई। इसके अलावा डाॅक्टर को मेकॉज में हर महीने सौ सीटी स्कैन के बाद 4 सौ रुपए अलग से इन्सेंटिव भी दिया जाने लगा। एक लाख और चार सौ का इन्सेंटिव डीएमएफटी मद से जबकि 60 हजार रुपए का वेतन छत्तीसगढ़ सरकार का वित्तीय विभाग दे रहा है। ऐसे में हर महीने डाॅक्टर को करीब एक लाख 60 हजार रुपए नकद और हर सौ सीटी स्कैन के बाद प्रति स्कैन के 4 सौ रुपए अलग दिए जा रहे हैं। ये पूरे भुगतान मिलाकर महीने में दो लाख रुपए से भी ज्यादा हो जाते हैं।
तत्कालीन कलेक्टर ने किया था अटैच
मेकॉज में नई सीटी स्कैन मशीन आने के बाद इसे चलाने रेडियोलॉजिस्ट नहीं मिल रहा था। इस बीच तत्कालीन कलेक्टर ने महारानी हॉस्पिटल से इस रेडियोलॉजिस्ट को मेकॉज में अटैच कर दिया। जिसे नियमानुसार उतनी ही सैलरी मिलनी थी जितने में नियुक्ति हुई थी। मेकॉज के अफसर कह रहे हैं कि उस समय तत्कालीन कलेक्टर ने जो व्यवस्था की थी हम उसे ही मान रहे हैं और उस समय रेडियोलॉजिस्ट की भी बेहद जरूरत थी।
जानिए, ये है कर्मचारियों के अटैचमेंट का नियम
स्वास्थ्य विभाग में किसी भी स्थायी कर्मचारी का अटैचमेंट जरूरत के हिसाब से एक से दूसरे हॉस्पिटल में किया जाता है लेकिन इस दौरान कर्मचारी का पे-स्केल नहीं बदलता है। उसे उतना ही वेतन दिया जाता है जो मूल पदस्थापना के दौरान तय होता है। संभाग में दो दर्जन से ज्यादा ऐसे डाॅक्टर हैं जो अटैचमेंट में काम कर रहे हैं इनमें से किसी भी डाॅक्टर को इतने पैसे नहीं दिए जा रहे हैं।
सीधी बात
डॉ. केएल आजाद, हॉस्पिटल अधीक्षक
सवाल - अभी जो रेडियोलॉजिस्ट हैं वह कहां से आए हैं?
- महारानी हॉस्पिटल में उनकी नियुक्ति है जरूरत को देखते हुए तत्कालीन कलेक्टर ने उन्हें अटैच किया है।
सवाल - उन्हें अलग से सैलरी और प्रति सीटी स्कैन कमीशन दे रहे हैं क्या?
- हां, तत्कालीन कलेक्टर ने व्यवस्था दी थी कि उन्हें कुल वेतन एक लाख 60 हजार और हर सौ सीटी स्कैन के बाद 4 सौ रुपए इन्सेंटिव के देते हैं।
सवाल - सरकारी स्थायी डाॅक्टर जो सेकेंड क्लास की पदस्थ है उसे कैसे अतिरिक्त सैलरी दे रहे हैं?
- डीएमएफटी मद से पैसे दे रहे हैं। कोई रेडियोलॉजिस्ट नहीं मिल रहा था ऐसे में पैसे दे रहे हैं।
सवाल - ये तो नियमों के खिलाफ हैं ऐसा नहीं होना चाहिए?
- ये आपके ऊपर है इसे निगेटिव या पॉजिटिव रूप में जैसा देखना हो देखें, अभी हम पैसे नहीं देंगे तो सीटी स्कैन कौन करेगा।
पांच महीनों से की जा रही पैसों की बर्बादी
यही नहीं, इस डाॅक्टर को महीने में सौ सीटी स्कैन के बाद हर सीटी स्कैन के चार सौ रुपए अलग से दिए जाने लगे। सरकारी हॉस्पिटल में सरकार से वेतन लेने वाले डाॅक्टर को अतिरिक्त रकम डीएमएफटी से दी जा रही है। सरकारी पैसों को फूंकने का ये काम एक-दो महीने नहीं, बल्कि 5 महीनों से चल रहा है।
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