दादरखुर्द में रथयात्रा निकालने की परंपरा 119 सालों से चली आ रही है। भक्तों की भारी भीड़ व लोगों के उत्साह के बीच रथयात्रा खींचने के लिए बढ़ने वाले हाथ इस बार नहीं दिखेंगे। 23 जून को मनाई जाने वाली रथयात्रा में ये पुरानी परंपराएं टूटेंगी।
रथ यात्रा की रस्म ही अदा की जाएगी। जिसमें सीमित लोग ही शामिल होंगे। बीमार पड़ने के बाद भगवान जगन्नाथ स्वास्थ्य लाभ ले रहे थे। शनिवार को महाप्रभु मंदिर में विराजमान हो गए। जिनका मंदिर के पुजारी ने श्रृंगार कर, हवन, पूजन व आरती की। अब 23 जून को रथयात्रा होगी, जिसमें महाप्रभु अपनी मौसी के घर गुंडिचा मंदिर जाएंगे। दादरखुर्द जगन्नाथ मंदिर में शनिवार को नेत्र उत्सव मनाया गया। कोरोना संक्रमण को देखते हुए मंदिर में पूजा विधि केवल पुजारी ने की। इस पूजा में भी कोई भक्त शामिल नहीं हुए और न ही प्रसाद चढ़ाया न ही बांटा गया। मुख्य पुजारी ने भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र, बहन सुभद्रा का संस्कार किया। प्रमु के नेत्र खोलकर शुद्धि की गई। मंत्रोच्चार के साथ उन्हें मंदिर में विराजमान कराया गया।
पुरी जाते-जाते गांव में बनवा दिया जगन्नाथ मंदिर
कृष्णा द्विवेदी ने बताया कि सवा सौ साल पहले रामभरोस व उनके छोटे भाई झाड़ूराम थवाइत जगन्नाथ पुरी जाते थे। वहां का उत्साह व लोगों में आस्था देखकर इनके मन में भी अपने ही गांव में मंदिर बनाने की सोच बनी और मंदिर बनाया गया।
ऐसा पहली बार होगा, जब रथ यात्रा में भक्त नहीं होंगे
दादरखुर्द स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर के मुख्य पुजारी रामेश्वर प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि रथयात्रा निकालते हुए 119 साल हो गए हैं। इतने लंबी अवधि ये पहला मौका है कि रथयात्रा में भक्त शामिल नहीं हुए होंगे।
अब बालको, छुरी, दीपका में भी निकलने लगी रथयात्रा
बालको प्लांट में अोडिशा से बड़ी संख्या में अधिकारी कर्मचारी काम करने यहां आए। पुरी के भगवान जगन्नाथ के प्रति उनकी आस्था बनी रही इसे देखते हुए बालको प्रबंधन ने रथयात्रा की शुरुआत की। यही परंपरा एसईसीएल गेवरा-दीपका प्रबंधन ने भी शुरू की है। देखते देखते हुए छुरी, दर्री व अन्य स्थानों से भी रथयात्रा निकलनी शुरू हो गई है। 23 जून को यहां भी रथयात्रा में भीड़ नहीं होगी।
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