कोरोना संदेही और वायरस से जीतकर डिस्चार्ज हुए मरीजों को रोकने के लिए नर्सिंग कॉलेज लगरा को कोविड-19 क्वारेंटाइन सेंटर बनाया गया है। जिला प्रशासन, नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग तीनों विभाग के अफसरों को यहां की देखरेख के साथ अन्य सभी व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी दी गई है, लेकिन यहां अंधेरगर्दी चल रही है। 100 लोगों को क्वारेंटाइन में रखने की व्यवस्था बनाने के लिए शासन ने 20 लाख रुपए मंजूर किए। 10 लाख रुपए दिए भी।
8 लाख खर्च भी हो गए, लेकिन हैरान करने वाली बात ये है कि अभी तक यानी पूरे कोरोना काल में सिर्फ 7 लोग ही यहां रुके हैं, इनमें चार चले गए और वर्तमान में तीन क्वारेंटाइन पीरियड काट रहे हैं। तीनों लोगों ने बातचीत में बताया कि व्यवस्था ठीक है लेकिन यहां अकेले रहते हैं तो डर सा लगता है, चूंकि अब यहां रख दिया गया है इसलिए समय काट रहे हैं, कोई मिलने भी नहीं आता।
खाना दूर से ही देकर चले जाते हैं। तीन मंजिल की बिल्डिंग में हम तीन लोग ही रह रहे हैं। रविवार को दोपहर 2 बजे क्वारेंटाइन सेंटर में सुरक्षा गार्ड के अलावा अन्य कोई भी जिम्मेदार अफसर वहां नहीं मिले। गार्ड ने बिना रोक टोक के अंदर जाने दिया और पुलिस कर्मी ताश के पत्ते खेलने में व्यस्त रहे, यानी सुरक्षा भी अधूरी।
तीनों विभाग की अलग जिम्मेदारी : नर्सिंग कॉलेज की इस बिल्डिंग में नगर निगम ने संदेहियों के लिए चादर, गद्दा, तेल, साबुन, तकिया और कूलर की व्यवस्था की है, पलंग पहले से ही थे। जबकि हैल्थ विभाग को संदेहियों का चेकअप और उन्हें किसी तरह की स्वास्थ्यगत परेशानी न हो यह जिम्मेदारी दी गई है। जिला प्रशासन संदेहियों के खाने से लेकर अन्य पूरी देखरेख कर रहा है। सवाल यह उठता है कि 8 लाख रुपए खर्च सिर्फ सात लोगों की देखरेख पर खर्च हो गए? अफसर इसे दबा रहे हैं।
नर्सिंग कॉलेज को क्वारेंटाइन सेंटर बनाया गया है, व्यवस्था बनाने के लिए 10 लाख मिले भी हैं, 8 खर्च भी हुए फिर क्यों वहां संदेहियों को नहीं रखा जा रहा है? इस सवाल पर कलेक्टर सारांश मित्तर ने कहा कि हमने क्वारेंटाइन सेंटर को तैयार कर, हैल्थ डिपार्टमेंट को हैंडओवर कर दिया है। वहां संख्या क्यों कम है? मैं नहीं बता पाऊंगा। स्वास्थ्य विभाग की टीम लगी है। सीएमएचओ से इस बारे में बात कर लीजिए।
तत्कालीन कलेक्टर ने लिया था निर्णय : स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक जब बिलासपुर में पहला कोरोना केस आया था। उसी समय तत्कालीन कलेक्टर संजय अलंग ने नर्सिंग कॉलेज की बिल्डिंग का निरीक्षण किया और उसे कोविड-19 क्वारेंटाइन सेंटर बनाने का फैसला किया।
सीएमएचओ डॉ. प्रमोद महाजन का कहना है कि क्वारेंटाइन में कोई आया नहीं है इसलिए संख्या कम है। जिनका यहां घर है, कमरे में लेट्रिन बाथरूम अटैच है तो उन्हें घर भेज देते हैं। जिनके लिए यहां कोई व्यवस्था नहीं है उन्हें ही क्वारेंटाइन में रखा है। संदेहियों को रखने के लिए ही बनाया गया है। हां थोड़ी दूर है इसलिए भी फर्क पड़ रहा है।
पंजाब में मां के निधन में शामिल होने गए, वहीं फंस गए, अब यहां फंसे हैं
27 मार्च से इस बिल्डिंग को कोविड-19 क्वारेंटाइन सेंटर का नाम दिया था। 20 दिन पहले शहर के कोविड अस्पताल से डिस्चार्ज होकर गए चार मरीजों को यहां रखा था। जो अब यहां से चले गए हैं। वर्तमान में बिल्डिंग की दूसरी मंजिल में रूम नंबर 58, 57 और 56 में संदेहियों को रखा गया है। मंगला निवासी एक बुजुर्ग ने बताया कि वे पिछले पांच दिनों से हैं। जांच हो गई है। घर कब जाएंगे ये पता नहीं, कोई मिलने भी नहीं आता।
पुराना सरकंडा निवासी युवक ने बताया कि लॉकडाउन नहीं था तब मेरी मां का निधन हो गया था। मैं अंतिम संस्कार में शामिल होने पंजाब गया और वहीं फंस गया। फिर किसी तरह चारपहिया गाड़ी की और 15 जून को बिलासपुर पहुंचा। यहां जांच में संदेही हो गया और तब से यहीं रुका हूं। मेरी बीबी अकेले घर पर है। उसके पैर में भी दिक्कत है, लेकिन अब यहां फंसे हैं, कब जाने दिया जाएगा ये बता पाना मुश्किल है। वहीं कोरोना से जंग जीतकर लौटे ताेरवा निवासी युवक ने बताया कि व्यवस्था तो ठीक है, चूंकि यहां किराए का घर है इसलिए यहीं क्वारेंटाइन पीरियड काट रहे हैं।
फोन करने पर आते हैं डॉक्टर
क्वारेंटाइन सेंटर प्रभारी गिरीश दुबे ने बताया कि संदेही और जो कोरोना मरीज डिस्चार्ज होकर आता है, उसे यहां रोका जाता है। इनकी देखरेख में हैल्थ विभाग से तीन लोग हैं। जो संदेही रुके हैं उनके खाने की व्यवस्था राजस्व विभाग कर रहा है। हैल्थ चेकअप स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी है। वहीं नगर निगम को तेल, साबुन, चादर, गद्दा, कूलर और अन्य सामान की व्यवस्था कर रहा है। अभी तक तो सात ही लोग रुके हैं। अगर किसी की तबीयत खराब होती है तो उसे सीधे अस्पताल भेज देते हैं। दाे-तीन दिन में एक बार जांच होती है। रात में गार्ड और पुलिस रहती है। डॉक्टर नहीं रहते। फोन करने पर आते हैं।
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