धरमपुरा के आस्था निकुंज में रह रहीं बुजुर्ग महिलाएं यहां सिर्फ इसलिए रह रही हैं, क्योंकि उनके बच्चों ने उन्हें घर से निकाल दिया है। सालों से यहां अपने जैसी महिलाओं के साथ रह रहीं बुजुर्ग महिलाएं आज भी अपने बच्चों को याद कर कई बार रोती हैं, लेकिन यहां आने के बाद न तो उनके बच्चों ने उनकी सुध ली और न ही किसी भी प्रकार से उनसे संपर्क करने की कोशिश की।
बच्चों ने ही अपने मां को परिवार से बहिष्कृत कर दिया है। बावजूद यहां रह रही बूढ़ी मांओं को आज भी अपने बच्चों का इंतजार है और वे हमेशा कहती हैं कि एक दिन उनके बच्चे उन्हें यहां से लेकर अपने घर चले जाएंगे। इसी उम्मीद में उनकी आंखें पथरा सी गई हैं।
और भी कई बुजुर्ग मां यहां रह रहीं, जिन्हें उम्मीद है कि उनके बच्चे आएंगे
ऐसी ही और भी बुजुर्ग महिलाएं यहां रह रही हैं, जो सालों से यहां रह रही हैं। उन्हें देखने अब तक न तो परिवार से कोई आया और न ही उनके बेटे ही यहां उनका हाल जानने पहुंचे। बावजूद हर रोज वे अपने बच्चों के बारे में ही सोचते हुए दिन काट देती हैं।
बच्चों को याद करनम हो जाती हैं आंखें
आस्था निकुंज में 20 सालों से रह रहीं महिलाओं का अब यही परिवार बन चुका है। अपने जैसे लोगों के बीच पहुंचकर बुजुर्गों को इस बात को लेकर टीस नहीं पालती कि वे अपनों से अलग रह रहे हैं। सुख-दु:ख बांटकर यहां रह रहे 13 बुजुर्ग एक-दूसरे का सहारा बने हुए हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि महिलाओं की अपने बच्चों को याद करते हुए नम हो जाती हैं।
1999 से रामबाई कर रहीं बच्चों का इंतजार
साल 1999 से यहां रह रहीं कुम्हारपारा की रामबाई बताती हैं कि वृद्धाश्रम खुलने के एक साल बाद से ही वे यहां हैं। पति की मौत के बाद बच्चों ने घर से निकालकर दर-दर की ठोकरें खाने छोड़ दिया। बावजूद आज भी उन्हें इस बात की उम्मीद है कि एक दिन उनके बच्चे आएंगे और उन्हें लेकर अपने घर जाएंगे। हर रोज वे अपने बच्चों का इंतजार करती हैं।
बेटे की मजबूरी थी, इसलिए यहां छोड़ गया
साल 2002 में यहां कुम्हारपारा से ही आईं सोनादई का कहना है कि उनके बच्चों ने मजबूरी में उन्हें यहां रख छोड़ा है। आज भी वे यह नहीं मान पातीं कि उनके बच्चों ने उन्हें परिवार से निकाल दिया है। वे बताती हैं कि परिवार की आय काफी कम है, इसलिए बेटे ने उन्हें यहां छोड़ा है। बीते करीब 18 सालों से यहां रहते हुए हर दिन वे अपने बेटे के आने के इंतजार में सामने ही बैठी रहती हैं।
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