केंद्र व राज्य सरकार मजरा- टोला तक बिजली पहुंचाने का दावा कर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। अब भी अंदरूनी क्षेत्र के गांव के सैकड़ों परिवार अंधेरे में जीवन यापन करने मजबूर हैं। ये वो गांव हैं, जहां लाइन खींचकर बिजली पहुंचाना सरकारी नुमाइंदों को महंगा पड़ रहा था, इसलिए रोशनी के लिए यहां सौर ऊर्जा सिस्टम लगाए गए थे।
सिस्टम तो लगा दिए, लेकिन क्रेडा(छत्तीसगढ़ रीन्यूएबल एनर्जी डेवलपमेंट ऐंजसी) ने इसके बाद कभी मुड़कर नहीं देखा। ऐसे में यहां लगे सोलर पैनल अब खराब पड़े हुए हैं। ऐसा ही हाल कोयलीबेड़ा ब्लॉक के ग्राम पोरियाहूर का है। यहां क्रेडा ने घरों में सोलर सिस्टम तो लगाया। इसके बाद इसकी देखरेख या सुधार के लिए कभी सर्वे तक नहीं किया। इसका नतीजा हुआ कि कुछ समय चलने के बाद सिस्टम जवाब दे गए। अब यह सोलर प्लेट कुछ घर के आंगन की शोभा बढ़ाने के काम आ रहा है, तो कुछ ने खपरैल पर टांग दिया है। इसके चलते प्रभावित परिवारों के लोग फिर वहीं चिमनी युग में लौट आए हैं। यहां सालभर से सोलर सिस्टम बंद पड़े हैं।
13 में 10 सिस्टम खराब : पोरियाहूर में 13 घरों में क्रेडा ने सोलर सिस्टम लगाया था। इसे लगाने के बाद विभाग के अधिकारी-कर्मचारी कभी गांव पहुंचकर लोगों को आने वाली परेशानियों को नहीं जाना। देखरेख के अभाव के चलते अब 10 सोलर सिस्टम खराब हो गए हैं।
सिस्टम खराब, चिमनीसे कर रहे लोग गुजारा
पोरियाहूर के 13 घरों के करीब 80 लोग रहते हैं। गांव में सोलर पैनल लगाया गया था, जो जून 2019 से बंद है। एक साल से ग्रामीण रात के समय चिमनी की रोशनी में रह रहे हैं। ग्रामीण कुले राम, केये राम गावड़े, मोडा, मनकू पद्द ने कहा घरों में लगे सोलर सिस्टम बंद हो गए हैं। फिर से चिमनी जलाना पड़ रहा है।
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