मां तो मां होती हैं। बच्चा दूर रहे या दुनिया छोड़ दे लेकिन ममता कभी खत्म नहीं होती। वो तो मां हैं और उसकी ममता हमेशा रहती है। आज मदर्स डे है। इस दिन हम दंतेवाड़ा की ऐसी दो मां की कहानी बता रहे हैं, जिनके मन में बेटों के लिए अपार प्रेम और ममता भरी है। सीने में दर्द है, तड़प है और बूढ़ी आंखों में आंसू भी हैं, क्योंकि उनका बेटा आज से उनसे बेहद दूर है। ये मां क्या सोचती हैं, बेटों के बगैर कैसे जीवन गुजार रहीं, उन्हीं के अनुभवों को जानने भास्कर टीम शहीद जवान राजेन्द्र गायकवाड़ और 5 लाख रुपए के इनामी नक्सली बुधरा सोढ़ी की मां से मिलने पहुंचीं।
लाश नहीं देखना चाहती, सुरक्षित ही घर आ जा, बहुत बीमार हूँ
नक्सली बुधरा सोढ़ी की मां आज भी अपने बेटे को याद कर फफक कर रो पड़ती है। बेटा 10 साल पहले नक्सल संगठन में कब शामिल हो गया था। इसका पता चला तो पैरों तले जमीन खिसक गई। टीम जिला मुख्यालय से करीब 50 किमी दूर बुधरा के गांव पखनाचुआ पहुंची। दुले इन दिनों गम्भीर बीमारी से जूझ रही हैं। यह हालत तब से हुई जब से बेटा ने अचानक घर छोड़ा। आज भी बूढ़ी आंखे बेटे का इंतजार कर रही हैं। बुधरा का नाम लेते ही मां पहले तो रो पड़ीं फिर बोल पड़ी कि बेटे की लाश नहीं देखना चाहती। हर दिन इस बात का भय रहता है, बेटा मारा न जाए। 10 साल पहले मासूम बच्चों, पत्नी व पूरे परिवार को वह अचानक रात को घर से भाग गया था। महीने भर बाद पता चला कि वह नक्सली बन चुका है। इसके बाद वह आज तक घर ही नहीं लौटा। हैं बहुत बीमार हूँ। तुम मुझे सुन रहे हो या किसी माध्यम से तुम्हें मेरी जानकारी मिल रही है, तो घर लौट आओ। बीमार हूँ, जिन्दगी के आखरी वक्त मैं तुम्हारे साथ गुजारना चाहती हूं।
इकलौता बेटा था, देश के लिए कुर्बान हुआ लेकिन गर्व होता है
भास्कर टीम शहीद जवान राजेन्द्र गायकवाड़ के घर भी पहुंचीं। उनकी मां पाकली बाई से मुलाकात की। शहीद बेटे का नाम लेते ही पाकली बिलख पड़ीं। बेटे की शहादत को 6 साल हो गए। बेटे की मौत का जख्म आज भी बरकरार है। पाकली कहती हैं इकलौता बेटा था। 18 साल की उम्र में ही नौकरी लग गई थी। जब मैं भयभीत होती तब वो मेरा मनोबल बढ़ाता कि मां मैं तुम्हारा बेटा हूँ। देश सेवा में सीने पर गोली खाकर ही मरूंगा। हुआ भी यही, नक्सलियों से लोहा लेते वक्त सीने पर ही गोली लगी थी। बेटे की मौत का गम है, मां हूँ, कभी नहीं भूला पाउंगी। याद आते ही दिल भर आता है। उसके बगैर तड़पती हूँ। लेकिन गर्व इस बात का है बेटा देश के लिए शहीद हुआ व तिरंगे में लिपटा मिला। शहीद की मां हूँ। जहां भी रहे मदर्स डे पर मुझे जरूर फोन करता था। उसे याद कर दर्द होता है। उसके नाम से पहचान मिली और जब सम्मान होता है तब लगता है आज भी मेरा लाल राजू जिंदा है, मेरे साथ है।
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