लॉ एंड ऑर्डर संभालने के साथ लोगों का इलाज, बच्चों के स्कूल में एडमिशन जैसे काम भी कर रहे ट्रेनी डीएसपी
(अमिताभ अरुण दुबे). छत्तीसगढ़ देश का संभवत: ऐसा पहला राज्य है, जहां कोरोना संकट के दौर में एक साथ 33 ट्रेनी डीएसपी अपने-अपने गृह जिलों में पुलिसिंग कर रहे हैं। इनमें 7 महिला अधिकारी भी हैं। ट्रेनी अधिकारियों में डॉक्टर, इंजीनियर जैसे अलग-अलग फील्ड के युवा हैं, जो पुलिस के रूटीन कामों के साथ अपने प्रोफेशनल फील्ड की विशेषज्ञता के जरिए लोगों तक राहत भी पहुंचा रहे हैं। कोई डॉक्टर के तौर पर लोगों का इलाज कर रहा है, तो कोई तकनीकी तौर पर आने वाला दिक्कतों का समाधान इंजीनियर के तौर पर भी कर रहा है।
नक्सली हिंसा से विस्थापित हुए बच्चों के बीच शिक्षा दिलवाने जैसी पहल भी हो रही है। छत्तीसगढ़ पुलिस अकादमी इन ट्रेनी अधिकारियों के अनुभवों को संजोने की तैयारी भी कर रही है। कोरोना संकट के निदान के बाद ये अधिकारी अपने अनुभवों पर रिसर्च पेपर भी सबमिट करेंगे, जो भविष्य में ट्रेनिंग के लिए आने वाले अधिकारियों के प्रशिक्षण के काम में आएगा। पुलिस ट्रेनी अकादमी के अधीक्षक आईपीएस विजय अग्रवाल के मुताबिक 1861 से ही पुलिस रेग्युलेशन एक्ट में महामारी के दौरान पुलिस के कामों के नियम कायदे बनाए गए हैं।
पुलिस सेवा में जाने वाले हर अधिकारी थ्योरी के रूप में इसे पढ़ते हैं। 1920 के बाद ऐसा पहला मौका है, जब अधिकारियों को प्रैक्टिकल के रूप में इसे करने का मौका मिला है। जाहिर है इस लिहाज से देखा जाए तो ट्रेनी अधिकारियों के लिए ये बड़ा मौका भी है।
पुलिस के जवानों के साथ आम लोगों का भी इलाज
प्रदेश के कोरबा जिले के पहले हॉट स्पॉट कटघोरा में कोरोना की दस्तक के बाद से डीएसपी डॉक्टर मेखलेंद्र प्रताप सिंह 200 से ज्यादा पुलिस के जवानों के साथ आम लोगों का इलाज और हेल्थ चैकअप भी करते हैं। 2019 बैच के अधिकारी मेखलेंद्र ने एमबीबीएस किया है। उनके मुताबिक जब कटघोरा हॉटस्पॉट बना तो उन्होंने लोगों का इलाज वो बैरियर पर भी करते हैं। वो पुलिस के जवानों के साथ ही यहां एक भवन में रह रहे हैं। जवान अधिकारी किसी भी हेल्थ इमरजेंसी या छोटी-मोटी दिक्कत में उनसे ही इलाज करवा रहे हैं।
नक्सल हिंसा से विस्थापित बच्चों की शिक्षा की पहल
ट्रेनी डीएसपी सुजीत सरकार नारायणपुर से जैसे अति नक्सल पीड़ित इलाके में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। यहां अबूझमाड़ में नक्सली हिंसा से पीड़ित विस्थापितों के बीच वो शांतिनगर में राहत पहुंचाने का काम कर रहे हैं। उनके मुताबिक करीब तीन से पांच हजार विस्थापितों में से ज्यादातर के पास आधार और राशन कार्ड भी नहीं है। बच्चों को शिक्षा मिले इसके लिए आधार कार्ड बनाने की पहल भी की जा रही है। दूरस्थ इलाकों तक राहत पहुंचाना एक बड़ी चुनौती रहा। यहां कम्यूनिकेशन के लिए कोई जरिया नहीं होता है। वो ओरछा,परसगांव, आंकाबेड़ा जैसे सुदूर इलाकों में भी गए। सुजीत के मुताबिक कोरोना के संकट में पुलिस को इन इलाकों में लोगों से जुड़ने का एक अच्छा अवसर मिला है। पुलिस पब्लिक बॉडिंग और ज्यादा मजबूत हुई है।
डेढ़ महीने से शीशे से ही बच्चे को दुलार
बिलासपुर में ड्यूटी कर रहीं ट्रेनी डीएसपी गीतिका साहू झुग्गी बस्तियों में लोगों को जागरूक कर रही हैं। रोजाना फील्ड पर पेट्रोलिंग और रिलीफ के काम करने के बाद वो जब घर पहुंचती हैं तो परिवारों वालों से अलग ही रहती हैं। इस दौरान गीतिका बहन के 11 महीने के बच्चे हर्ष को शीशे के पार से दुलारती भी हैं।
स्टडी मटेरियल में इनके अनुभवों को उपयोग करेंगे
^ट्रेनी अधिकारियों के लिए ये एक बड़ा मौका साबित हो रहा है। हम चाहते हैं कि फील्ड पर वो जो भी अनुभव कर रहे हैं वो आने वाले प्रशिक्षु के अधिकारियों की ट्रेनिंग के लिए भी काम आएं। इसलिए इनके अनुभवों को हम स्टडी मटेरियल के तौर पर भी उपयोग करेंगे।
- विजय अग्रवाल, अधीक्षक, पुलिस ट्रेनिंग अकादमी
Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today
from Dainik Bhaskar https://ift.tt/2KZB3m4
via
Comments
Post a Comment