ए क सवाल बार-बार लोग पूछ रहे हैं- आखिर छत्तीसगढ़ कोरोना की वैश्विक महामारी से कैसे बचा रह गया? क्यों यहां कोरोना उस तरह पैर नहीं पसार पाया, जैसा पड़ाेसी राज्य महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में फैला है? सात राज्यों से घिरा होने के बावजूद छत्तीसगढ़ में अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति कैसे है? हालांकि इसके दावे-प्रतिदावे अलग-अलग हो सकते हैं। पर यह बात भी सही है कि कोरोना के मात्र 62 मरीज यहां मिले हैं और अब तक एक भी मौत यहां नहीं हुई है। इसका सीधा सा जवाब जो मिल रहा है, वह है-पूर्वानुमान और ग्राउंड कनेक्ट। पूर्वानुमान इस लिहाज से कि छत्तीसगढ़ में बंदिशें केंद्र सरकार से पहले लागू कर दी गईं। और ग्राउंड कनेक्ट इस लिहाज से कि सरकार की हर जिले की सीमा और गतिविधि पर सीधी नजर रही। इसमें कोई संदेह नहीं कि जिस ढंग से मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पूर्वानुमान के साथ राज्य की किलेबंदी की, उससे पड़ोसी राज्यों से कोरोना का कहर छत्तीसगढ़ की सीमा में प्रवेश नहीं कर पाया। कटघोरा वाले केस को अपवाद मान लें तो किसी भी शहर में ऐसी स्थिति नहीं बन पाई कि राज्य में कर्फ्यू जैसे हालात पैदा हों। कटघोरा में एक युवक का महाराष्ट्र से आकर यहां की बस्ती में घूमने का मामला कटघोरा को हॉटस्पाट बना गया। बाकी किसी भी क्षेत्र में कोरोना ने कम्युनिटी संक्रमण का रूप नहीं लिया। वैसे देखा जाए तो कोरोना की रोकथाम से लेकर उसके बाद के उपायों पर राज्य सरकार ने जो कदम उठाए हैं उसकी वजह से आज छत्तीसगढ़ कई मामलों में दूसरे राज्यों से बेहतर स्थिति में खड़ा है। सारे फैसलों को सिलसिलेवार देखने से समझ आता है कि अनायास ही किस्मत से संक्रमण से नहीं बचे हैं। सबसे पहले 27 जनवरी काे रैपिड रिस्पांस टीम बना दी गई। 28 जनवरी से एयरपोर्ट पर स्क्रीनिंग शुरू कर दी गई। एक फरवरी से पहला आइसोलेशन अस्पताल शुरू हो गया। केंद्र के फैसले के पहले ही राज्य सरकार ने 21 मार्च को ही राज्य की सीमा सील कर दी। 22 मार्च को राज्य के बाजार बंद कर पहले ही लॉकडाउन कर दिया गया। जैसे ही कोरोना की आहट हुई स्कूलों को बंद करने का पहला एहतियातन कदम उठाया गया। फिर सरकारी दफ्तरों को बंद िकया और बाजार का समय भी तय कर दिया गया। श्रमिकों के लिए ट्रेन चलाने की बात हो या फिर गरीबों को राहत पहुंचाने की, छत्तीसगढ़ ने ही इसकी शुरुआत की। गरीबों को तीन महीने का राशन मुफ्त देने का ऐलान कर भूपेश ने राज्य के 45 लाख परिवारों की बड़ी चिंता दूर कर दी कि काम बंद होगा तो आखिर राशन कहां से आएगा। इतना ही नहीं, बाकी जगह कर्मचारियों के वेतन से कटौती का ऐलान हो गया लेकिन छत्तीसगढ़ ने कह दिया-हमारे कर्मचारी दिन-रात लोगों की सेवा में लगे हैं इसलिए उनका वेतन नहीं काटा जाएगा। वनोपज संग्रहण में राज्य के लाखों गरीब लगे रहते हैं इसलिए महुआ जैसे वनोपज की कीमत 17 से बढ़ाकर 30 रुपए कर दिया गया। बता दें कि देश के कुल वनोपज संग्रहण का 99 फीसदी हिस्सा छत्तीसगढ़ ही पूरा करता है। किसानों को फसल बीमा और प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना के 900 करोड़ रुपए उनके खाते में दिए जा चुके हैं। मनरेगा में 20 लाख से अधिक मजदूरों को काम दे दिया गया।
इन सबका परिणाम यह रहा कि सेंटर फार मानीटरिंग इंडियन इकानॉमी की रिपोर्ट जारी हुई तो उसमें अप्रैल माह में छत्तीसगढ़ में बेरोजगारी की दर केवल 3.4 प्रतिशत बताई गई। यह देश में दूसरे स्थान पर है। उसी रिपोर्ट में देश में बेरोजगारी की दर 23.5 प्रतिशत बताई गई है। कोरोना संकट के चलते मंदी की मार से राज्य को बचाने के लिए 19 लाख किसानों को किसान न्याय योजना की राशि मई महीने में ही बांटने का फैसला कर लिया गया ताकि राज्य की अर्थव्यवस्था चलती रही। किसानों का पैसा बाजार में आएगा तो दूसरे लोगों का भी रोजगार बराबर चलता रहेगा। वैसे किसानों को इस योजना के तहत चार किस्तों में पूरे साल पैसा देने की योजना है। इसके पीछे सोच यही है कि पूरे सालभर यहां बाजार में मंदी का असर उतना न हो जैसा दूसरी जगह पर होगा। इसी प्रकार शराब पर 10 प्रतिशत तक कोरोना टैक्स लगाने का फैसला लिया गया। इसके पीछे की सोच यही है कि इससे तकरीबन 500 करोड़ रुपए सरकार को मिलेंगे। इस राशि से स्कूल-अस्पताल व अन्य जरूरी रूटीन के काम के लिए फंड जनरेट होगा। कुल मिलाकर देखा जाए तो कोरोना संकट से निपटने के लिए एक दिशा में सरकार ने काम किया और उसी का परिणाम है कि कोरोना का संक्रमण स्थानीय स्तर पर लगभग पूरी तरह समाप्त हो गया है। बाहर से आ रहे श्रमिकों के बीच से ही इक्का-दुक्का केस आ रहे हैं। इन सबसे हटकर राज्य में बाजार वापस अपनी पुरानी स्थिति की ओर लौटता नजर आ रहा है।
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