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7 साल में तैयार किया काजू का हाइब्रिड बीज, अब पौधे तैयार करने में जुटे वैज्ञानिक

प्रदेश में बस्तर और जशपुर जिले के पठार में काजू की खेती कई वर्षों से की जा रही है लेकिन इससे किसानों को उम्मीद के मुताबिक फायदा नहीं हो रहा है। काजू उत्पादक किसानों की आय बढ़ाने और कम रकबे में अधिक उत्पादन के लिए बस्तर कृषि महाविद्यालय के डीन एचसी नंदा और वैज्ञानिक डॉ विकास रामटेके अब काजू के हाइब्रिड पौधे तैयार करने में जुटे हुए हैं। प्रदेश में यह पहली बार है जब किसी कृषि महाविद्यालय में संचालित अखिल भारतीय काजू अनुसंधान परियोजना में हाईब्रिड पौधे तैयार किए जा रहे हैं।
वैज्ञानिक रामटेके ने कहा कि इस पौधे से जो फल तैयार होगा उससे बीज तैयार किया जाएगा। इस काम में करीब पांच साल लग जाएंगे। इससे पहले बस्तर के कृषि वैज्ञानिक डॉ मंगल सिंह पैकरा, डॉ धनंजय शर्मा और डॉ केआर साहू ने सात साल की मेहनत के बाद इंदिरा काजू- 1 नाम का बीज तैयार किया था जो काजू के अन्य बीजों की तुलना में करीब डेढ़ गुना मोटा है। किसानों को प्रोत्साहित करते हुए इस साल 150 से ज्यादा किसानों को बीज दिया गया।

12 हजार हेक्टेयर में खेती, पौधे की ऊंचाई 20 फीट, गुच्छे में लगेंगे फल
जिले में इस समय काजू की खेती करीब 12 हजार हेक्टेयर में की जा रही है। इसकी खेती में जिले के 1200 किसान लगे हुए हैं। अधिकतर जगहों पर काजू के पुराने वेरायटी के पौधे लगे हैं जिनका उत्पादन काफी कम होता है और ये काफी लंबे हैं जिसका कोई फायदा किसानों को नहीं मिलता है। नई हाईब्रिड पौधे की ऊंचाई केवल 20 फीट होगी वहीं वे झुंड में फलेंगे । वैज्ञानिक रामटेके ने बताया कि पौधे की चौड़ाई और ऊंचाई कम होने से किसान कम जगह में अधिक पौधे लगाकर इसका लाभ लेंगे जिसका फायदा उन्हें बड़े पैमाने पर मिलेगा । उन्होंने कहा कि बस्तर के किसान सालों से काजू की उच्च वेरायटी के पौधे की मांग करते आ रहे हैं । समय - समय पर उन्हें काजू की नई वेरायटी के पौधे भी दिए गए हैं लेकिन इसका फायदा उम्मीद के मुताबिक नहीं मिला है।

बकावंड ब्लाॅक में सबसे अधिक 6 हजार हेक्टेयर में हो रही है खेती
काजू की खेती को बढ़ावा देने का काम सालों से वन और उद्यानिकी विभाग के साथ ही कृषि महाविद्यालय के द्वारा किया जा रहा है। नतीजा यह है कि हर ब्लाक में इसकी खेती हो रही है, लेकिन इसकी खेती सबसे अधिक 6 हजार हेक्टेयर में बकावंड ब्लाक में की जा रही है । यहां के किसान अब तक इंदिरा काजू - 1, वेंगुर्ला 4, वेंगुर्ला 9 और के 22-1 के साथ ही अन्य चार प्रकार की वैरायटियों की खेती कर रहे हैं । कृषि महाविद्यालय के डीन और इस अनुसंधान में पौध प्रजनक के रूप में काम कर रहे डॉ एचसी नंदा ने बताया कि यह प्रोजेक्ट भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र पुत्तूर से संबंधित है। नंदा ने कहा कि वैज्ञानिक डॉ विकास रामटेके ने गतवर्ष ही कृषि महाविद्यालय को सर्वश्रेष्ठ केंद्र का पुरस्कार दिलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, उन्हें नए प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी सौंपी गई है ।



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Cashew hybrid seed prepared in 7 years, now scientists engaged in plant preparation


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