महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना के तहत जिलेभर में पानी की कमी को दूर करने 5 हजार कुएं खोदे जा रहे हैं। इनमें से 112 कुअाें के निर्माण शुरू भी कर दिया गया है।
दंडकारण्य के पठार की दूसरी सबसे ऊंची पहाड़ी केशकाल में होने के साथ ही इस इलाके में वर्षा में तो जल की मात्रा पर्याप्त होती है। जिससे ये कृषि कार्य सकुशलता से कर लेते हैं लेकिन सर्दियां आते ही सारा पानी पहाड़ों के ढालों से होकर नदियों में चला जाता है। ऐसे में बारिश के दिनों में जल की प्रचुरता वाला यह इलाका गर्मी आते तक पानी के लिए तरसता नजर आता है। इसलिए पानी की कमी को दूर करने और जल का संरक्षण करने यह पहल की जा रही है।
इस तरह पहाड़ी पर किया जाएगा कुओंका निर्माण
ऊंचे चट्टानी इलाकों में पानी सतह से बहकर नदी में चला जाता है। इन क्षेत्रों में चट्टानी संरचना के कारण बोर करके जल की निकासी संभव नहीं होती। ऐसे में इन केशकाल पहाड़ी क्षेत्र में इन प्राकृतिक नालियों के मार्ग पर ही कुओं का निर्माण किया जाएगा। मानसूनी वर्षा के साथ प्राप्त जल पहाड़ी ढालों में सीढ़ीनुमा बने कुओं में संरक्षित किया जाएगा। जिससे इन क्षेत्रों में जल स्तर बढ़ने के साथ ही शुष्क मौसम में पेयजल और निस्तारी के लिए ग्रामीणों को पानी मिल सकेगा। किसान भी साल में दो से तीन फसलों का उत्पादन कर सकेंगे। जिससे इस क्षेत्र की आय बढ़ेगी।
112 कुओं के लिए मार्किंग हुई, काम भी शुुरू हो गया
केशकाल जनपद सीईओ एसएल नाग ने बताया कि जिला खनिज न्यास की निधि से मनरेगा के माध्यम से ग्रामीणों द्वारा 5 हजार से अधिक कुएं बनाए जा रहे हैं। इसके लिए अभी 112 कुओं की मार्किंग पूर्ण कर इसमें खनन का कार्य चालू कर दिया गया है। इससे इन क्षेत्रों की पेयजल की समस्या दूर होने के साथ ग्रामीणों को रोजगार भी मिलेगा। इन 112 कुओं में ग्राम पंचायत कुएं में 20, चेरबेड़ा में 13, कुम्मुड़ में 09, मिरदे में 10, माडगांव में 05, भंडारपाल में 15, कुधड़वाही में 07, रावबेड़ा के उपरबेदी में 12 अाैर बेडमा मारी में 15 कुओं का निर्माण किया जाना है।
मनमाेहक घाटियाें के लिए प्रसिद्ध है इलाका
केशकाल की पहाड़ियां मनमोहक घाटियों और सागौन के वृक्षों के लिए प्रसिद्ध है। इन घाटियों से बारदा, भंवरडीह और दूध नदियों का उद्गम होने के साथ इसमें चर्रे-मर्रे, मलाजकुडुम जैसे सूंदर जलप्रपात भी विद्यमान हैं। इन घाटियों के ऊपर कुएमारी, चेरबेड़ा, कुम्मुड़, मिरदे, भंडारपाल, माड़गांव, उपरबेदी, बेड़मामारी, रावबेड़ा जैसे अनेक जनजातीय गांव बसे हैं। इन गांवों में रहने वाले सदियों से मुख्यधारा से अलग वनों में अपना गुजर बसर करते हैं। आय के लिये मुख्य रूप से मानसून पर ही निर्भर हैं। ऐसे में ये क्षेत्र जिले के अत्यंत पिछड़े इलाकों में शामिल हो जाते हैं।
बैठक में ग्रामीणों ने बताई समस्या फिर बनी योजना
कलेक्टर नीलकंठ टीकाम को गत फरवरी में मुरनार में हुई बैठक में ग्रामीणों ने इस समस्या से अवगत कराया। जिस पर उन्होंने जनपद, तहसील एवं अन्य संबंधित अधिकारियों से संयुक्त टीम बनाकर कार्ययोजना बनाने के निर्देश दिए। कलेक्टर ने 5 हजार कुओं से जलसंकट से निपटने योजना को अमल में लाने का आदेश दिया।
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