शनिवार को सुबह पुणे महाराष्ट्र और अन्य प्रदेशों से आने वाले मजदूरों को लेकर जैसे ही बस ट्रक मालवाहक की गाड़ियां खरतोरा नाका में मेडिकल जांच के लिए रुके तो बहुत से मजदूर परिवारों से भास्कर ने बात की। इन मजदूरों ने बताया कि बु॰धवार से शनिवार तक उन्हें खाना नहीं मिला। शनिवार को उन्हें जब खरतोरा नाका पर तीन दिन बाद अपने प्रदेश में दाल भात खाने को मिला तो सबसे पहले उन्होंने बच्चों के मुंह में निवाला डाला। नाके पर करीब 8 गाड़ियों से 700 से ज्यादा लोग भोजन के इंतजार में थे, सभी ने पहले अपने बच्चों को खाना खिलाया, उन्हें लगा कि खाना खत्म होने से पहले भूखे बच्चों के पेट भर लें, हम पालक तो फिर भी घर जाकर खा लेंगे। हालांकि बाद में उन्हें भी खाना मिल गया।
इन मजदूरों में चंद्रमा पति मनीष सतनामी कुकुरडीह भी शामिल थी। वह अपने दो मासूम बच्चों को खाना खिला रही थी और पति उनके लिए पानी का इंतजाम कर रहा था। चंद्रमा ने आयुष और दर्पण को अपने हाथ से निवाला खिलाते हुए बताया कि वे बुधवार को पुणे से निकले पर गाड़ी के इंतजार में ही 24 घंटे बस स्टैंड पर गुजारने पड़े। वहां से बस ने गोंदिया बार्डर तक छोड़ा, गोंदिया से प्रदेश की बस में बैठे, जिसने रायपुर तक छोड़ा। रायपुर से मेडिकल जांच के बाद बलौदाबाजार फिर एक बस ने छोड़ा। इस बीच बिस्किट और पानी से काम चलाया। हर जगह बस न छूट जाए के डर से खाना नसीब नहीं हुआ। गाड़ी न छूटे इस चक्कर में वे पुणे बस स्टैंड से हिले भी नहीं जिसके कारण कहीं खाना भी नही खा पाए। हालांकि बच्चों को खिलाने के बाद उन्हें भी खाना नसीब हुआ तो कहा- यहां खाना खाकर शरीर में कुछ तो जान आई।
गाड़ी न छूट जाए इसलिए खाना खाने नहीं उतरे
इसी तरह की मिलता-जुलता दर्द हर मजदूर का था। सबके साथ छोटे बच्चे थे। जानकी बाई, धनेश्वरी, कविता, भारती, दूजराम, महेश, संतोष राजेन्द्र, शैलेन्द्र दीपक, जगदीश, तुलेश डोमार, जानकी, सरस्वती, दीपा, फुलेश्वरी, रागनी, चंचल, पार्वती, मीना, कुमारी बाई, अंजली, आदि ने बताया कि वे महाराष्ट्र, बीजापुर, हैदराबाद से लौट रहे हैं। रास्ते में कहीं-कहीं खाने की व्यवस्था जरूर थी मगर गाड़ी छूट न जाए इसलिए कहीं उतरे ही नहीं। दो-दो, तीन-तीन दिनों तक बगैर नहाए खाए सिर्फ सफर कर रहे हैं कि किसी तरह घर पहुंच जाएं फिर सब ठीक हो जाएगा। अपनों से मिलने की चाह में भूख भी नहीं लग रही है। वहीं खरतोरा नाका पर अन्य राज्यों के अलावा रायगढ़, बिलासपुर, मुंगेली, मस्तूरी, जांजगीर, चांपा, कोरबा के मजदूर भी ट्रकों और बसों से लौट रहे हैं जो यहां पर रुककर भोजन करने के बाद आगे बढ़ रहे हैं।
जो दो निवाला प्रेम से खिला दे वही भगवान
सभी मजदूरों ने नाके पर भोजन-पानी के सरकार के प्रबंध की मुक्त कंठ से सराहना की। उन्हीं के शब्दों में... इस संकट की घड़ी में जो दो निवाला प्रेम से खिला दे वही आज का भगवान है। मजदूरों ने कहा हमारी हालत बेहद खराब है जो मौत से लड़कर घर तक पहुंच रहे हैं क्योंकि जिस तरह वे लोग गाड़ियों में 1500 से 2000 किलोमीटर की दूरी तय कर जान जोखिम में डालकर गाड़ियों के ऊपर बैठकर लगातार आ रहे हैं इससे भयानक त्रासदी और क्या हो सकती है।
430 मजदूर लौटे, बच्चों का चप्पल पहनाकर स्वागत

भाटापारा| शनिवार को श्रमिक स्पेशल ट्रेन लखनऊ से कुल 430 मजदूरों को लेकर पहुंची। मजदूरों की सकुशल घर वापसी जिला प्रशासन ने श्रमिकों के छोटे-छोटे बच्चों को चप्पल पहनाकर उनका रेलवे स्टेशन पर स्वागत किया। सभी को बारी-बारी से सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए उन्हें क्वारेंटाइन सेंटर भेजा गया। शाम 4.30 बजे बलौदाबाजार भाटापारा एवं कवर्धा जिले के कुल 430 श्रमिक घर वापस आए। इसमें बलौदाबाजार भाटापारा जिले के 118 और कवर्धा के 312 मजदूर शामिल हैं।
सभी का स्वास्थ्य परीक्षण निर्धारित प्रोटोकॉल के अनुसार हुआ जिसमें से कुछ लोगों का रेंडमाइजेशन तरीके से भी सैम्पल लिया गया। सभी श्रमिकों को मुर्रा-चना, ओआरएस और छाछ के पैकेट देकर भेजा गया। जिला पंचायत सीईओ आशुतोष पाण्डेय एवं अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक ने बच्चों को खुद चप्पल खुद पहनाकर बसों से भेजा। कवर्धा जिले के ग्राम खैरवार के निवासी बोधनदास मानिकपुरी (33) ने बताया कि वह पिछले 8 महीनों से लखनऊ में था, वहां मिस्त्री का काम करता है। उसने सकुशल घर वापसी पर भूपेश सरकार को धन्यवाद दिया।
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