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नक्सलियों ने परेशान किया लेकिन 30 साल से वहीं कर रहीं ड्यूटी

बस्तर के संवेदनशील इलाकाें में शुमार दंतेवाड़ा जिले में स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ करने में स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों की बड़ी भूमिका है। इनमें स्टाफ नर्सों का सबसे अहम रोल है। जिला अस्पताल से लेकर धुर नक्सलगढ़ सबसे संवेदनशील गांव बेंगपाल इलाके में बेहतर काम करने ये पीछे नहीं हैं। नर्स-डे पर भास्कर ने जिला अस्पताल में सेवा देने वाली सीनियर नर्स शंकरी और जिले के सबसे दुर्गम धुर नक्सलगढ़ इलाके में सेवा देने वाली 54 साल की नैना कश्यप से खास बातचीत की।

10 से ज्यादा नर्सों को सिखाया कॉपर-टी लगाने का तरीका

जिला अस्पताल की सीनियर नर्स शंकरी मित्रा की यहां सबसे बड़ी भूमिका है। 21 सालों से वे स्टाफ नर्स के रूप में मरीजों की सेवा कर रही हैं। 1999 से करीब 9 सालों तक बचेली अपोलो अस्पताल और फिर 2008 से दंतेवाड़ा जिला अस्पताल में सेवाएं दे रही हैं। 2014 में वे जिला अस्पताल के प्रसूति वार्ड की प्रभारी बनीं। इनके प्रभारी बनने के करीब सालभर बाद यहां ऑपरेशन होना शुरू हुआ। ये जिला अस्पताल की पहली सीनियर नर्स हैं जिन्होंने कॉपर टी लगाने की स्पेशल ट्रेनिंग लीं, इस वार्ड की करीब 10 नर्सों को भी सिखाया व हर दिन मनोबल बढ़ाया। जिले में सबसे पहले कॉपर-टी लगाने की शुरुआत इन्होंने ही की थी। इसके बाद से हर महीने औसतन 25- 30 महिलाओं को कॉपर-टी लगाई जाने लगी। इसके लिए जिला अस्पताल को अवॉर्ड भी मिला था। शंकरी भी बेस्ट वर्क के लिए दो बार सम्मानित की जा चुकी हैं। शंकरी अभी मेडिकल वार्ड की प्रभारी हैं और कोरोना से जंग भी लड़ रही हैं। शंकरी बताती हैं प्रसूति वार्ड काफी संवेदनशील वार्ड होता है, क्योंकि यहां प्रसूता से लेकर नवजात की जिंदगी का ख्याल रखना पड़ता है। कई बार जूनियर डर जाया करती थीं। उनका मनोबल बढ़ाकर सिखाया कि काम से डरना और भागना नहीं है बल्कि सीखना है।
जिस जगह लोग आना नहीं चाहते वहां डटी हैं एएनएम नैना

जिले का धुर नक्सलगढ़ गांव बेंगपाल। पहुंचने के लिए चुनौती रास्तों की, नक्सलियों की। यहां तक पहुंचने पुरुषों के पसीने छूट जाते हैं। ऐसे इलाके के 54 साल की एएनएम नैना कश्यप 30 सालों से काम कर रही हैं। वे बताती हैं इंटरव्यू के वक्त पूछा गया था अंदरूनी गांव भेजेंगे तो कैसे करोगी? जवाब था कि नौकरी नहीं मरीजों की सेवा पहला कर्तव्य है, जहां भेजो जाउंगी और हुआ भी वही। नैना बेंगपाल के पहले नक्सलगढ़ गांव माडेंदा में पदस्थ थीं। नौकरी के 30 बरस इन गांवों में निकाल दिए। माडेंदा, नीलावाया, बर्रेम, बेंगपाल, पुरंगेल जैसे गांवों में पहुंचने की चुनौती के साथ नक्सली तो कभी पुलिस के पूछताछ से परेशान होतीं। तब भी हिम्मत नहीं हारीं। पति की 10 साल पहले मौत हो गई। 3 बच्चों को पालने की जिम्मेदारी कंधों पर आ गई। नैना तब भी नहीं हारीं। तकलीफें सिर्फ यहीं तक नहीं रहीं बेटी की शादी की, दामाद की सड़क हादसे में मौत हो गई। नौकरी से लेकर निजी जिंदगी की सारी चुनौतियों के बाद भी वे नक्सलगढ़ में काम कर ही रही हैं। वे इन गांवों में नर्स के साथ बल्कि डॉक्टर की भूमिका में भी हैं। कोरोना योद्धा भी बनी हुई हैं। इनके इलाके के 150 से ज्यादा ग्रामीण होम क्वारेंटाइन में हैं। टीम के साथ कई किमी पैदल ही निकल जाती हैं ताकि ग्रामीण सुरक्षित रहें।



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