राजू शर्मा | जिंदगी में इतने बुरे दिन कभी आएंगे ऐसा कभी सोचा भी नहीं था। मजदूरी करने अपने और परिवार के लिए दो वक्त की रोटी की व्यवस्था तो कर ही लेता था। शुक्र है लॉकडाउन के 15 दिन पहले ही परिवार को गांव में छोड़ आया था। नहीं तो उनकी जान भी जोखिम में डाल देता। कई सालों से सिकंदराबाद में मजदूरी कर रहे थे। जो पैसे कमा पाते थे खाना-खर्चा तो चल ही जाता था। लॉकडाउन में काम बंद हो गया और हम सड़क पर आ गए। जो पैसे थे, उससे अब तक जीवन चला। जब घर का किराया देने तक को पैसे नहीं बचे, तो पैदल वापस घर चलने का फैसला किया। मैं राधाकांत दास, मेरे साथी रमेश मांती, मुलई दास, सुकुमार दास, गोविंद दास, कार्तिक माइति और प्रदीप दास सहित सभी 10 लोग 8 मई को पैदल निकल पड़े। राधाकांत दास ने बताया कि उनके पास न तो कुछ खाने के लिए था। और न किराया के लिए पैसे थे, भगवान का नाम लेकर चल पड़े। 8 दिन से लगातार चल रहे हैं। रास्ते में लोगों से मांगकर खाना। कुछ लाेगाें ने खुद से खिलाया। कहा जाए तो भीख मांगने की नौबत आ गई। घर में भी सब हैरान हैं, परेशान हैं। चिता में हैं। रो रहे हैं। करें तो करें क्या। आठ दिन में 800 किमी का सफर तय कर बिलासपुर पहुंचे। चूंकि रास्ता नहीं मालुम इसलिए पूछ-पूछ कर चल रहे हैं। कुछ दूर कहा जाए तो 200 किमी ट्रेस से आए। अभी तो कोलकाता तक यानी 700 किमी और जाना है। 1500 किमी का सफर पैदल तय करना बहुत कठिन है। लेकिन हमारे पास दूसरा कोई रास्ता भी नहीं बचा है। कोनी रोड़ पर सड़क के किनारे बैठादेख इन मजदूरों को एक इंसान ने ब्रेडदी और पीने के लिए पानी की भी व्यवस्था करवाई। सभी 10 लाेगाें ने ब्रेड खाई और रास्ता पूछा।
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