सुधीर सागर| कोरोना हर तबके और हर उम्र के लिए किसी दहशत से कम नहीं है। फिर भी, राजधानी से सैकड़ों लोग खतरा उठाकर भी कुछ न कुछ ऐसा कर रहे हैं, जिनसे जरूरतमंदों को राहत मिले। ऐसी ही एक कोशिश है 12वीं की छात्रा सोनी चौहान की। टाटीबंध में रहनेवाली सोनी भारतमाता स्कूल की छात्रा है। वह ज्यादा कुछ नहीं करती। अपनी साइकिल लेकर रोज दोपहर टाटीबंध चौक पहुंच जाती है। दूर से मजदूरों का परिवार सामान और बच्चों के साथ पैदल आता दिखा नहीं कि साइकिल लेकर उनके पास पहुंचती है। एकाध सूटकेस और बच्चा हो तो उसे साइकिल पर बिठाकर चौक या जहां उन्हें गाड़ी मिले, वहां तक जाती है। मीलों चलकर आरहे लोगों के लिए आधा किमी की यह राहत किसी संजीवनी से कम नहीं है। भास्कर टीम सोनी चौहान से शुक्रवार को दोपहर 1 बजे मिली। तब वह एक परिवार का सूटकेस साइकिल पर रखकर उनके पीछे चल रही थी। इस बात से बिलकुल बेखौफ कि इससे उसे संक्रमण का खतरा हो सकता है। चेहरा कपड़े से ढंका हुआ, हर बार हाथों को सेनिटाइज करने की कोशिश और कड़कती धूप में मजदूरों के साथ उनका बोझ उठाकर इधर से उधर। वह भी पूरी दोपहर यानी कम से कम 4 घंटे तक। सबसे दिलचस्प पहलू ये है कि उसे किसी ने प्रेरित नहीं किया। रोजाना मजदूरों की व्यथा अखबारों पर पढ़कर उसने खुद ही फैसला लिया। आठ दिन हो गए, वह इसी में जुटी है।
मदद का मौका मिला, यही काफी
सोनी ने भास्कर को बताया कि मीडिया में लगातार आरहा है कि हमारे घर के पास यानी टाटीबंध चौक पर लोग सैकड़ों किमी से पैदल चलकर आ रहे हैं। उनके पास सामान है, गोद में बच्चे हैं। काफी दिन से लग रहा था कि मैं क्या करूं। फिर लगा कि मेरे पास साइकिल है, इसी से कुछ मदद की जाए। बस, यही सोचकर रोज साइकिल लेकर चौक पर आजाती हूं। जहां मजदूरों की टोली दिखे, उनका सामान इधर से उधर पहुंचाती हूं। अगर वे भूखे-प्यासे संघर्ष कर अपने घरों तक जा रहे हैं, तो उनकी यही मदद कर सकती हूं। खुशी का बात ये है कि वह जिसका सामान और बच्चे लेकर चलती है, पूरा परिवार उसे आशीर्वाद देता है... सोनी कहती है-बस, यही काफी है...।
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