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100 गांवों में मई से होती थी पानी की किल्लत, वहां के कुएं व हैंडपंपों में भरपूर पानी, मरम्मत के 50 लाख बचे

सरगुजा जिले के सौ से अधिक गांव गर्मी के मौसम में पेयजल की भारी कमी से जूझने लगते थे। आलम यह रहता था कि रनपुरकलां गांव के सभी हैंडपंप सूख जाते थे। वहीं चिखलाडीह गांव के लोग नदी में गड्ढा खोदकर निस्तार के लिए पानी जुटाते थे। यही हाल लगभग सभी गांवों में रहता था।
इस साल लगातार बारिश होने के कारण इन गांवों में पानी की कोई भी परेशानी नहीं हो रही है। गांवों के सभी हैंडपंप और प्राकृतिक जल स्रोतों में भरपूर पानी है। वहीं जिले के सभी बांध भी इस मौसम में लबालब भरे हुए हैं। सबसे बड़े घुनघुट्टा बांध में अभी भी मैनपाट के तराई इलाके से पानी आ रहा है। हैंडपंप ड्राय नहीं होने के कारण इनमें पाइप भी नहीं बढ़ाए जाने और मरम्मत की जरूरत न होने के कारण पचास लाख से अधिक की बचत हुई है। अप्रैल और मई के महीनों में जिले के सौ से अधिक गांवों में पानी की भीषण किल्लत होने लगती थी। आंकड़ों के अनुसार अप्रैल महीने में जहां औसत बारिश 15.4 मिमी होती थी। वहीं इस साल यह बारिश 57.7 मिमी हुई है। वहीं मई महीने में भी 15 मिमी से अधिक बारिश हो चुकी है।
प्राकृतिक जल स्रोतों में पर्याप्त जल का भंडारणऑ
प्राकृतिक जलस्रोत लबालब हैं। जिले के डैम की बात करें तो बरनई डैम में 8.85 मिलियन घन मीटर पानी है जो भंडारण क्षमता का 79.73 प्रतिशत है। इसी प्रकार बाकी डैम में 4.2 मिलियन घन मीटर पानी है, जो भंडारण क्षमता का 24.5 प्रतिशत है। इसी प्रकार शहर से लगे घुनघुट्टा बांध की बात करें तो पिछले साल यहां पर पानी का स्तर इन दिनों तल के पास तक पहुंच गया था, जबकि इस साल यहां पूरा बांध लबालब भरा हुआ है। अभी भी मैनपाट के तराई इलाके से बांध में पानी भर रहा है।
धान और सब्जियों के लिए बारिश है फायदेमंद
अप्रैल-मई में हो रही बारिश जहां किसानों के लिए आफत साबित हो रही है। वहीं कुछ किसानों के लिए फायदे का सौदा भी साबित हो रही है। उप संचालक कृषि एमआर भगत ने बताया कि रुक-रुककर हो रही बारिश से भिंडी और टमाटर की खेती करने वाले किसानों के लिए फायदेमंद है। इसके अलावा जिले में ग्रीष्मकालीन धान का रकबा 347 हेक्टेयर है, जो इस साल भी बोया गया है। धान के लिए भी बारिश से फायदेमंद होगी। इससे सिंचाई के लिए पानी की परेशानी नहीं होगी।
इस बार नहीं आई पानी की एक भी शिकायत: गुप्ता
जिला पंचायत उपाध्यक्ष राकेश गुप्ता ने बताया कि अंबिकापुर ब्लॉक में एक ड्राय बेल्ट है। सभी सातों ब्लॉक के सात से दस गांव ऐसे हैं, जहां गर्मियों में पानी की किल्लत होने लगती है। इसके लिए वहां टैंकर या फिर अन्य माध्यमों से पानी पहुंचाया जाता था। धीरे-धीरे इस समस्या का स्थाई समाधान तो किया जा रहा है। मई महीने तक जहां 60 से 70 गांवों से पानी की शिकायतें आने लगती थीं, वहीं इस साल अभी तक किसी गांव से भी पानी की परेशानी की शिकायत नहीं आई है।
पिछले साल के मुकाबले लगभग दस मीटर कम गिरा जलस्तर: ईई
बारिश का सबसे अधिक असर ग्राउंड वाटर पर पड़ा है। पिछले सालों में मई महीने में जिले के 60 से 70 गांवों में वाटर लेबल 21 से 30 मीटर तक गिर जाता था। जबकि इस बार लगभग 15 से 20 मीटर से भी कम गिरा है। इस तरह से औसत दस फीट तक मई में वाटर लेबल कम घटा है। पीएचई के ईई प्रदीप खलखो ने बताया कि जिले में 13 हजार हैंडपंप हैं और पिछले साल तक हर साल 10 हजार मीटर तक गर्मी में पेयजल के लिए हैंडपंपों में पाइप बढ़ाने पड़ते थे, जबकि इस साल छह महीने में मात्र पांच हजार मीटर पाइप बढ़ाने पड़े हैं। इस बार सभी हैंडपंपों से पानी निकल रहा है। सालों बाद ऐसी स्थिति है कि मई में ज्यादातर हैंडपंप सूखे नहीं हैं। मरम्मत न होने और पाइप नहीं बढ़ाए जाने के कारण पचास लाख से अधिक रुपयों की बचत हुई है।



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There was a shortage of water in 100 villages since May, there is plenty of water in wells and hand pumps, 50 lakhs of repairs left


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